Billionaire Empire System29 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 29

7 min read November 7, 2026

"यार रवि, ये जगह…" लुट्टन ने पान थूका, पर आज थूक भी डरा हुआ लगा। "यहाँ तो दिन में भी कोई नहीं आता। सुना है रात को यहाँ कुत्ते भी नहीं भौंकते।"

रवि नक्शा जेब से निकालकर देख रहा था। लाल स्याही का तीर ठीक उसी खिड़की की तरफ़ इशारा कर रहा था। उसने घड़ी जेब से निकाली — काँच पर कोई नई लाइन नहीं, बस वही पुरानी खरोंच। सिस्टम चुप था। पूरी तरह चुप।

"तू चुप है?" रवि ने धीरे से पूछा।

कोई जवाब नहीं।

उसने घड़ी जेब में रखी और पीछे की दीवार पर लगे पुराने लोहे के पाइप पकड़कर ऊपर चढ़ना शुरू किया। पाइप में ज़ंग थी, हाथ फिसलता जा रहा था, और नीचे लुट्टन फुसफुसा रहा था, "धीरे, अरे धीरे! मेरी शादी भी नहीं हुई अभी, मुझे मरवाना है क्या?"

रवि खिड़की तक पहुँचा। जाली के दोनों ताले लगे थे, पर बीच का शीशा टूटा था — जैसे कोई जान-बूझकर तोड़कर अंदर झाँकता हो। वो टूटे हिस्से में से अंदर देखने लगा।

अंदर एक बड़ा, खाली कमरा था। छत से टिमटिमाती एक पीली बत्ती लटक रही थी, जो हवा से हल्की-हल्की हिल रही थी। बीच में लोहे की एक कुर्सी पड़ी थी — उलटी। उसके पास फ़र्श पर कुछ लाल था — सूखा खून या कोई पुराना पेंट, मालूम नहीं पड़ रहा था। और उस कुर्सी के चारों तरफ़ रस्सी के टुकड़े बिखरे थे।

कुर्सी खाली थी।

रवि का दिल एक पल के लिए रुक गया। इरा वहाँ नहीं थी।

"क्या हुआ?" नीचे से लुट्टन की घबराई आवाज़ आई। "कुछ बोल क्यों नहीं रहा?"

रवि ने गला साफ़ किया। आवाज़ निकली, पर वो उसकी अपनी नहीं लगी। "कुर्सी खाली है।"

"मतलब… मतलब हम गलत जगह आ गए!" लुट्टन की आवाज़ हकलाने लगी। "यार मैंने कहा था न, मुझे नींद में भी ऐसी जगहें दिखती हैं। निकल यहाँ से, अभी। तेरी माँ का वास्ता, नीचे आ।"

रवि नीचे उतरने ही वाला था कि तभी अंदर से एक आवाज़ आई।

बहुत धीमी आवाज़ थी — गुनगुनाने की। कोई बूढ़ी आवाज़, जो एक ही सुर में बार-बार कुछ गा रही थी, जैसे प्रार्थना और गाने के बीच का कोई शब्द हो। रवि के रोंगटे खड़े हो गए। ये आवाज़ उसने पहले सुनी थी। नहीं — ये आवाज़ वो पिछले कई दिनों से रोज़ सुन रहा था, दुकान के सामने, सुबह की चाय के साथ।

"मुन्ना भाई…" रवि ने फुसफुसाया।

वो खिड़की के टूटे हिस्से से अंदर घुसा। काँच ने उसकी आस्तीन चीर दी, पर उसे फ़र्क नहीं पड़ा। वो धीरे-धीरे उस आवाज़ की तरफ़ बढ़ा।

कमरे के दूर वाले कोने में, एक टूटी अलमारी के पीछे, मुन्ना भाई बैठे थे। घुटने सीने से लगाए, सिर झुकाए हुए, और गुनगुना रहे थे। उनके गले में तुलसी की माला थी, और उँगलियाँ उसे इतनी कसकर पकड़े हुई थीं कि नाखून सफ़ेद पड़ गए थे।

रवि ने एक कदम आगे बढ़ाया। फ़र्श पर पड़ी एक टूटी ईंट उसके पैर से टकराई।

"छन्न!"

मुन्ना भाई का गुनगुनाना एकदम रुक गया। उन्होंने सिर उठाया, और उनकी आँखों में वो डर साफ़ दिखा — बच्चे जैसा डर, जो जानता है कि मार पड़ेगी पर भागना नहीं आता। फिर उन्होंने रवि को पहचाना, और वो डर थोड़ा-थोड़ा छँटने लगा।

"तू?" उन्होंने फुसफुसाया। "तू आ गया?"

रवि उनके पास घुटनों के बल बैठ गया। "मुन्ना भाई, इरा कहाँ है? वो लड़की — जो कुर्सी पर बँधी थी — कहाँ है?"

मुन्ना भाई ने होंठ काँपते हुए पहले इधर-उधर देखा, फिर रवि के कान के पास झुककर बोले, "मैंने कहा था न, मुझे धमकाया था। दुकान के आसपास दिखा तो लाश मिलेगी — यही कहा था। पर आज…" उनकी आँखें भर आईं, "आज मैंने उन्हें सब बता दिया। उनके आदमी मुझे यहाँ उठाकर लाए, मुझसे पूछ रहे थे कि तूने किसको क्या बताया। मैंने कह दिया — सब कुछ। सब।"

रवि ने उनका हाथ पकड़ लिया। "क्या बताया, मुन्ना भाई? किससे?"

"मैंने बता दिया कि तेरे पापा ने मुझे क्या कहा था। वो घड़ी वाली बात।" मुन्ना भाई की आँखों से एक आँसू ढुलककर माला पर गिरा। "और फिर मैंने कह दिया कि तू आज रात यहाँ आएगा। मैंने तुझे बेच दिया, बेटा। मैं बूढ़ा हूँ, बहुत डरा हुआ हूँ…"

रवि का हाथ उनकी पकड़ में था, और वो पकड़ काँप रही थी। कमरे की पीली बत्ती ऊपर हल्की हल्की हिल रही थी और उनका साया दीवार पर छोटा-बड़ा हो रहा था।

"वो लड़की नीचे की तहखाने में है," मुन्ना भाई ने फुसफुसाया, जैसे ये सब कोई सुन न ले। "पर सुन, सीढ़ियों के पास वो पत्थर वाले दरवाज़े पर कुछ मत गिराना। वहाँ… वहाँ…" और अचानक उनकी आवाज़ फिर बदल गई, खो गई, और वो फिर गुनगुनाने लगे।

रवि ने उन्हें हल्का हिलाया। "मुन्ना भाई! मुन्ना भाई, वहाँ क्या है?"

कोई जवाब नहीं।

तभी बाहर से लुट्टन की चीख आई — इतनी तेज़ कि काँच की टूटी खिड़कियाँ झनझना उठीं।

"रवि! पीछे से तीन आदमी आ रहे हैं! रवि!"

रवि एक पल भी नहीं रुका। उसने मुन्ना भाई के कंधे पकड़े और उन्हें सीधा किया। उनकी आँखों में देखा — वही डर, वही भरी हुई आँखें, वही फटे हुए होंठ।

"मुन्ना भाई, तुम मेरे साथ क्यों आए?" रवि की आवाज़ भारी थी। "मालूम है तुम्हें, जान का ख़तरा है। फिर भी।"

मुन्ना भाई ने गुनगुनाना रोका। उन्होंने रवि के चेहरे को देखा, और उनकी आवाज़ अचानक बिलकुल साफ़ हो गई — जैसे बरसों से जमी धूल अचानक हट गई हो।

"जान का ख़तरा मांगने से आता है, बेटा?" उन्होंने कहा। "तेरे पापा ने कभी नहीं सोचा। वो रोज़ रात कोई न कोई काम करते थे — किसी के बेटे की फ़ीस, किसी की दवाई, किसी बूढ़े को घर। और सुबह दुकान खोलते, चाय बनाते, हँसते। एक बार मैंने पूछा था — 'रघु भाई, तुम्हें डर नहीं लगता?' तो वो हँसे और बोले — 'डर से ज़्यादा चाय ठंडी होने का डर है, मुन्ना। जब तक केतली गरम है, तब तक सब ठीक है।'"

रवि के हाथ काँप रहे थे। उसकी जेब में घड़ी थी, और लगा जैसे वो भी यही सुन रही हो।

"अब जा," मुन्ना भाई ने उसे धक्का दिया। "नीचे जा। सीढ़ियाँ पीछे की तरफ़ हैं, उस टूटी अलमारी के पीछे। और सुन —"

रवि पलट चुका था।

"वो लड़की तेরে बारे में कुछ कह रही थी जब मैं वहाँ था। बोल रही थी — 'वो आएगा। वो ज़रूर आएगा। वो चाय वाला है, उसका दिल गरम है।'"

रवि रुक गया। एक पल के लिए दुनिया थम गई। उसने पीछे मुड़कर देखा, पर मुन्ना भाई फिर गुनगुनाने लगे थे, सिर झुकाए, जैसे उन्होंने जो कहना था कह दिया।

रवि अलमारी के पीछे से निकला। सामने एक पुरानी लकड़ी की सीढ़ी थी जो नीचे अँधेरे में खो जाती थी। सीढ़ी के पहले पायदान पर हाथ रखते ही उसने महसूस किया — लकड़ी गीली थी, जैसे किसी ने अभी-अभी जूते पोंछे हों।

वो पहला कदम उतरा। दूसरा।

और तभी एक तेज़ रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी — इतनी तेज़ कि उसकी आँखें चौंधिया गईं और वो हाथ से चेहरा ढककर दीवार से टिक गया। नीचे से टॉर्च की सफ़ेद किरण सीढ़ियों पर फैल गई।

और फिर एक आवाज़ आई — ठंडी, नपी-तुली, जैसे किसी ने बर्फ़ को बोलने की तालीम दी हो।

"बेटा, हमें तो बस तेरा ही इंतज़ार था।"

रवि का हाथ दीवार पर जम गया। रोशनी के पीछे से एक लंबा, दुबला साया आगे बढ़ा — काला चश्मा, दस्ताने पहने हुए हाथ, और चेहरे पर वो हल्की, पत्थर जैसी मुस्कान।

मुश्ताक़।

"घड़ी लाए या नहीं?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ में जैसे कोई अपनी ही जीत का हिसाब लगा रहा हो।

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