Billionaire Empire System – Chapter 16
मुश्ताक़ रवि के कान के पास झुकता है। उसकी साँस ठंडी है, पुदीने की।
"साहब ने कहा है," वो धीरे से कहता है, "घड़ी अगर मिल जाए तो लौटा देना। बड़ी पुरानी चीज़ है। हमारे साहब के पापा की रही होगी।"
रवि का गला सूख जाता है। वो कुछ नहीं बोलता।
मुश्ताक़ पीछे हटता है। फिर जाते-जाते रुककर मुड़ता है। काले चश्मे के पीछे से उसकी आँखें दिखती नहीं, बस आवाज़ आती है — ठंडी, नपी-तुली।
"और सुन, बेटा। जो लोग साहब की पुरानी चीज़ों में उलझते हैं, उन्हें देखते हैं ना…" वो एक पल रुकता है। "वो बहुत दूर नहीं जाते।"
सफ़ेद गाड़ी स्टार्ट होती है। गली की धूल हवा में उड़ती है और कुछ देर तक सब कुछ धुँधला रहता है। फिर गाड़ी गली के मुहाने से निकल जाती है, और सन्नाटा लौटता है — बस, पहले से भारी।
लुट्टन दौड़कर आता है। उसका चेहरा पीला है, होंठों की पान की लाली भी फीकी पड़ गई है।
"यार रवि, ये…" उसकी आवाज़ फँस जाती है। "ये खुद आया? ये तो कभी नहीं आता। गली में तो इसके आदमी आते हैं। सालों से इसकी गाड़ी इस गली में नहीं आई।"
दादी कम्मो धीरे-धीरे आती हैं। छड़ी की टक-टक दूर से सुनाई देती है। आकर रवि के सामने खड़ी हो जाती हैं और उसका चेहरा देखती हैं। उनकी आँखें झुर्रियों में धँसी हुई हैं, पर उनमें कुछ साफ़ है।
"अरे रे रे," वो कहती हैं। "आज तो सुबह से ही नींबू-मिर्ची लटकानी चाहिए थी।"
"दादी, वो घड़ी माँग रहा है," रवि धीरे से कहता है।
दादी एक पल चुप रहती हैं। फिर अपना पान चबाती हैं और बोलती हैं, "माँगेगा। माँगने वालों का काम ही माँगना होता है।" वो रवि के हाथ पर अपना झुर्रीदार हाथ रखती हैं। "पर बेटा, जो चीज़ तेरे पापा ने अपनी जान देकर बचाई हो, वो माँगने से नहीं दी जाती।"
दिन भर रवि दुकान पर रहता है, पर उसका मन कहीं और है। हर ग्राहक की आवाज़ में उसे सफ़ेद कुर्ता दिखता है। जब कोई कार गली के मुहाने से गुज़रती है, उसका हाथ केतली पर रुक जाता है। तीन बार चाय में चीनी देनी भूल जाता है, और एक बार चाय दो बार छानता है।
शाम को जब सब चले जाते हैं, वो एक बेंच पर बैठ जाता है। दादी की पर्ची जेब में है। क़ासिम भाई। श्मशान के पीछे, झोपड़ी। पर सिस्टम कहता है — लेवल दस के बाद। और वो अभी लंबा रास्ता है।
घर लौटकर वो सीधे माँ के कमरे में जाता है।
सीता देवी बिस्तर पर बैठी हैं। उनके सामने रामायण खुली है, पर उनकी आँखें उस पर नहीं हैं। उनका चेहरा पीला है और हाथ कम्बल को पकड़े हुए हैं, जैसे ठंड लग रही हो, हालाँकि कमरा गर्म है।
"माँ, आज दवा ली?" रवि उनके पास बैठ जाता है।
"ले ली, बेटा।" माँ मुस्कुराती हैं। पर मुस्कान उनकी आँखों तक नहीं पहुँचती। "तू बता, आज चेहरा क्यों लटका है? दिन भर मुझे तेरी आवाज़ आती रही — केतली गिराने की, और तेरे पैरों की।"
रवि एक पल सोचता है कि क्या कहे। फिर चुप रहने की जगह सच ही कह देता है, धीरे से। "आज बलवंत राय खुद गली में आया था। दुकान पर।"
माँ का हाथ कम्बल पर जम जाता है। उनके चेहरे का रंग और उड़ जाता है। वो कुछ देर चुप रहती हैं, फिर उनकी आँखों में वही डर आ जाता है जो रवि ने उस रात देखा था, जब वो पापा की आख़िरी रात की बात छेड़ते ही रुक गई थीं।
"क्या कहा उसने?" माँ की आवाज़ फुसफुसाहट बन जाती है।
"कहा कि पापा उसके दोस्त थे।" रवि अपनी जेब से घड़ी निकालता है। टूटी, चुप्पी साधे, काला काँच। "माँ, ये घड़ी आपने पहले कभी नहीं दिखाई। न पापा के जाने से पहले, न बाद में। हमें कुछ बताइए।"
माँ घड़ी को देखती हैं। बहुत देर देखती हैं। उनकी उँगलियाँ कम्बल से खिसककर घड़ी की तरफ़ बढ़ती हैं, पर छूती नहीं। जैसे छूने से कोई पुराना दर्द फिर से ज़िंदा हो जाएगा।
"ये घड़ी तेरे पापा के पास आख़िरी हफ़्ते में आई थी," वो धीरे से कहती हैं। उनकी आवाज़ टूट रही है, हर शब्द जैसे ताकत से निकल रहा है। "मैंने कभी उनके हाथ में नहीं देखी थी। रातों को वो जागते, और… और छुपाकर इसे देखते। "
रवि कुछ नहीं बोलता। उसकी साँस भी रुकी हुई है।
"एक रात मैंने पूछ लिया।" माँ की आँखें भर आती हैं। "बोले — 'सीता, अगर मुझे कुछ हो जाए, तो ये घड़ी रवि के हाथ में ही देना। ये सब खोलेगी।'"
कमरे में चुप्पी छा जाती है। खिड़की के बाहर कहीं एक झींगुर बोलता है, फिर रुक जाता है।
रवि अपना हाथ बढ़ाकर माँ का हाथ पकड़ता है। उनके हाथ सूखे हैं, नसें उभरी हुई, और उँगलियाँ काँप रही हैं।
"माँ, आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
"डर था, बेटा।" माँ उसकी तरफ़ देखती हैं। उनकी आवाज़ में सालों की थकान है। "तेरे पापा के जाने के बाद मैंने सोचा — बस, अब मेरे बच्चे सुरक्षित रहें। मैंने खुद को समझाया कि जो हुआ, उसे भूल जाऊँ। पर भूलती कहाँ थी? हर रात वही।" वो रुक जाती हैं, होंठ दबा लेती हैं। "अब तू पूछ रहा है तो बता दिया। पर रवि…" उनकी आवाज़ में लोहा आ जाता है, जो बच्चों की बात में आ जाया करता है, "तू कुछ ऐसा मत करना जिससे मुझे तेरा चेहरा देखने के लिए तरसना पड़े। मैंने एक चेहरा देखा है, जाते हुए। दूसरा नहीं देख सकती।"
रवि उनके पैरों के पास बैठ जाता है। माथा उनके घुटनों पर रख देता है। कुछ देर दोनों चुप रहते हैं। फिर वो धीरे से कहता है, "माँ, मैं वादा करता हूँ। जो सच पापा ने छोड़ा है, वो मैं निकालकर रहूँगा। पर आपको कोई तकलीफ़ नहीं होने दूँगा। ये मेरा वादा है।"
माँ उसके बालों में हाथ फेरती हैं। उनकी उँगलियाँ उसके सिर पर रुक जाती हैं, जैसे कुछ कहना चाहती हों, पर बोलती नहीं।
रवि घड़ी उठाता है और उसे सीने से लगा लेता है। काँच ठंडा है। धातु में हल्की-सी कँपकँपी है, जैसे अंदर कुछ ज़िंदा हो। वो आँखें बंद कर लेता है।
तभी बाहर गली में एक कार चटाक! से ब्रेक लगाती है। ऐसी आवाज़, जैसे शीशा फूट गया हो।
माँ चौंककर उठती हैं। रवि घड़ी को जेब में खिसका देता है और खिड़की की तरफ़ देखता है। बाहर अंधेरा है, बस गली के कोने की लाइट में एक काली गाड़ी की परछाई दिख रही है।
और फिर लुट्टन की आवाज़ आती है — फटी हुई, घबराई हुई, साँस फूली हुई।
"रवि! रवि, बाहर आ! ओ रवि!"
रवि दौड़कर बाहर जाता है। लुट्टन गली के बीच खड़ा है। उसका चेहरा पसीने से भीगा है, हाथों में उसका पुराना मोबाइल काँप रहा है, और उसकी आँखें ऐसी हैं जैसे उसने कुछ ऐसा देखा हो जो वो देखना नहीं चाहता था।
"क्या हुआ?" रवि उसका हाथ पकड़ता है।
"बाहर आ, तेरी माँ के लिए एक मैसेज आया है।" लुट्टन का गला सूखा है। वो मोबाइल की स्क्रीन रवि की तरफ़ घुमाता है। "किसी ने कहा है…"
वो पूरा वाक्य नहीं बोल पाता। रवि स्क्रीन पढ़ता है।
फिर लुट्टन की आवाज़ काँपकर निकलती है, "किसी ने कहा है — 'जो सच तू ढूँढ रहा है, वो तेरी माँ को मार डालेगा।'"
रवि के हाथ से मोबाइल फिसलने लगता है। पर वो पकड़ लेता है। उसके कान में दूर से सिस्टम की आवाज़ आती है, ठंडी और साफ़ — "नया मिशन खुल गया है। माँ को बचाओ। इनाम…"
आवाज़ अधूरी रह जाती है।
गली के कोने पर वो काली गाड़ी अब भी खड़ी है। उसका इंजन बंद है। और उसके अंदर, अंधेरे में, कोई बैठा है जो शायद देख रहा है कि रवि का चेहरा कैसा होता है जब उसकी दुनिया हिलती है।
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