A Dark Secret – Chapter 536
मैंने रजिस्टर बंद किया, एक ही बार में, बिना ज़ोर लगाए। जिल्द ने आवाज़ की, छोटी, जैसे कोई बहुत पुराना दरवाज़ा बंद हो। और जब मैंने उसे बगल में रखा, तो दीवारों से — हवेली की, गली की, कमरे की — वे लाइनें मिटने लगीं जो उभरी हुई थीं। मेरी नज़र रजिस्टर के बाहर लगी ईंट पर गई, जहाँ "चौथा पत्थर" खुदा था, और वहाँ अब सिर्फ़ पीली धूल थी, जो हवा ने उड़ा दी।
बाहर निकलते वक़्त मैंने मनोहर को आख़िरी बार देखा। वह फाइलें समेट रहा था, धीरे-धीरे, एक-एक काग़ज़, और अपनी ही लिखाई पढ़कर चौंक रहा था, जैसे किसी और की लिखाई हो। उसने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली।
दरवाज़े पर रुककर मैंने काजल की तरफ़ देखा। वह माँ की गोद में सो रही थी — नहीं, सो नहीं रही थी, बस आँखें बंद किए अपनी माँ की उँगलियाँ पकड़े बैठी थी, जैसे कोई बच्चा स्कूल जाने से पहले खुद को तैयार करता है।
बाहर गली में सूरज सिर पर आ गया था। मैंने रिया का हाथ पकड़ा, अमिया का हाथ रिया ने, और हम तीनों एम्बुलेंस की तरफ़ बढ़े। एम्बुलेंस अब भी वहीं खड़ी थी, बत्ती बुझी हुई, और उस पर कोई स्याही नहीं थी — न शीशे पर, न पीछे के दरवाज़े पर। सिर्फ़ धूल और रिया की तस्वीर, डैशबोर्ड पर, जैसे हमेशा थी।
रामदीन ने गाड़ी की चाबी मेरी तरफ़ फेंकी। मैंने पकड़ी।
"तुम चलाओ," मैंने कहा। "आज मैं पीछे बैठूँगी।"
वह हँसा। "चालीस साल बाद? गाड़ी भूल जाऊँगा।"
"कोशिश कर लो," मैंने कहा। "बुढ़ापे में याद रखने का अभ्यास अच्छा रहता है।"
वह गाड़ी में बैठा। मैं पीछे बैठी, रिया और अमिया बीच में। सिपाही ने गेट पर हाथ उठाया। बलवान गाड़ी के पास आया और उसने खिड़की से अंदर झाँककर कहा, "मैडम, मजिस्ट्रेट के पास जाना है। गवाही का काग़ज़ है। दो-तीन दिन लगेंगे।"
"लगने दो," मैंने कहा। "मैं अब भी यहीं रहूँगी। जब भी बुलाओ।"
वह सिर हिलाकर हटा। रामदीन ने गाड़ी चालू की, वह पुराना इंजन बुरी तरह खाँसा और फिर चल पड़ा।
सड़क पर शहर गुज़रने लगा। पुराना बाज़ार, जहाँ कुछ दुकानों के बोर्ड अब नए नामों से चमक रहे थे और कुछ पर अभी भी पुराने नाम की गीली स्याही सूख रही थी। अस्पताल, जिसके गेट पर तीन लोग खड़े थे — एक औरत, एक बूढ़ा आदमी और एक लड़का — सब अपनी-अपनी जेब से कुछ निकालकर एक-दूसरे को दिखा रहे थे, जैसे नाम वाले काग़ज़। बस अड्डा, जहाँ किसी ने पुरानी बस को पीले रंग में रंगना शुरू कर दिया था। शांति विहार की नई कॉलोनी, जहाँ ब्लॉक नौ के बाहर एक औरत अपने बच्चे को गोद में उठाए खड़ी थी और वह नाम-पट्टा पढ़ रही थी जो दो महीने से उतरा हुआ था और आज सुबह लौट आया था।
फिर पुराना कब्रिस्तान आया, बाईं तरफ़, चारदीवारी के पीछे से सिर्फ़ कुछ पत्थर दिख रहे थे। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। मैं आगे देखती रही, सड़क पर, जो सीधी दूर तक जाती थी। रिया ने मेरी तरफ़ देखा, शायद यह सोचकर कि मैं कुछ कहूँगी। मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ चीज़ें बोलने से ही छूट जाती हैं।
हम शहर से निकल आए, दोपहर होते-होते। रास्ते में एक छोटा ढाबा आया जहाँ हमने चाय पी और रामदीन ने पहली बार चालीस साल में अपना पूरा नाम चाय वाले को बताया, और चाय वाले ने कहा कि वह इसे लिख लेगा, क्योंकि वह अपने सारे ग्राहकों के नाम लिखता है, चाहे काम कुछ न हो।
तीन महीने बाद।
दूसरे शहर का यह अस्पताल सरोज नगर वाले से छोटा है, भीड़ भी कम, और इमरजेंसी वार्ड के बाहर की बेंच टूटी भी नहीं है, टेढ़ी है। मैं वहीं खड़ी हूँ, वर्दी में, गाड़ी की चाबी जेब में, और सामने वाले बोर्ड पर नए शहर का नाम लिखा है जो मुझे अब भी पढ़ने में थोड़ा अजीब लगता है। तीन महीने में आदमी आदत डाल लेता है, नाम नहीं।
रिया नई स्कूल जाती है, दूसरी गली में, जहाँ उसकी एक नई दोस्त है जो उसे हर रोज़ कुछ नया सिखाती है। अमिया भी वहीं पढ़ने लगी है, सावित्री के साथ एक किराए के कमरे में रहती है, और रोज़ शाम को दोनों लड़कियाँ मेरे पास आ जाती हैं और एम्बुलेंस धोने में हाथ बँटाती हैं, जिसमें असल में वे ज़्यादा पानी फैलाती हैं। रामदीन इसी अस्पताल में रात की ड्यूटी पर लग गया है, क्योंकि यहाँ के सुपरवाइज़र ने उसकी उम्र नहीं पूछी, सिर्फ़ कहा कि गाड़ी चला सकता है तो आ जाओ। काजल किसी मनोचिकित्सक के पास जाती है, हफ़्ते में दो बार, और अपना नाम फिर से सीख रही है। कभी-कभी वह मुझे फोन करती है और पूछती है कि वह कौन है, और मैं कहती हूँ — काजल हरनाम, एक औरत जो अपनी बेटी को उसका नाम याद है। वह हँसती है, और फिर फोन रख देती है। सावित्री उसके साथ रहती है। कभी-कभी लगता है कि सावित्री ने चालीस साल की पढ़ाई एक ही साल में कर ली है।
आज छुट्टी का दिन है। मैंने एम्बुलेंस धोई, सुखाई, और अब चाय की दुकान पर बैठी हूँ, जो अस्पताल के पीछे वाली गली में है। रिया मेरे बगल में बैठी है और वह अपने जूते के फीते को सुलझा रही है, जो हर हफ़्ते उलझता है। सामने की बेंच पर एक बूढ़ा आदमी बैठा है, सत्तर से ऊपर, हाथ में पुरानी छड़ी, आँखें दूर कहीं।
उसने चाय का प्याला उठाया, फिर रख दिया, और चाय वाले से पूछा, "भाई, मैं यहाँ कहाँ से आया था? किस गली से?"
चाय वाला हँसा और बोला, "अब मुझे क्या पता, बाबा। रोज़ नए आदमी आते हैं।"
बूढ़े ने अपना सिर खुजाया। "किसी गली का नाम याद है," उसने कहा, "पर नाम नहीं आ रहा। कोई औरत थी… नहीं, कोई दुकान थी… नहीं, कुछ और था।"
मैं उठी, चाय वाले से एक और प्याला लिया, और उस बूढ़े के सामने रख दिया।
"धीरे-धीरे याद आ जाएगा," मैंने कहा। "जल्दी क्या है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो चाय की भाप में खो गया। उसने प्याला उठाया और चुपचाप पीने लगा।
रिया ने मेरा हाथ खींचा।
"माँ, हम कभी सरोज नगर लौटेंगे?"
मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। "अभी नहीं।"
"कभी तो?"
"एक दिन ज़रूर," मैंने कहा। "जब वहाँ कोई नाम किसी की जेब में न हो।"
वह सिर हिलाकर मान गई, जैसे हर बच्चा मान लेता है जब माँ कहती है कि अभी नहीं, पर कभी ज़रूर।
रात को हम छोटी सराय के कमरे में हैं — एक बिस्तर, एक खिड़की, और नीचे सड़क पर एक दीया जल रहा है जिसे हवा बुझा नहीं पा रही। रिया बिस्तर पर लेटी है और उसकी गोद में वही पुराना रजिस्टर है — मैंने उसे फेंका नहीं, उसकी ज़िद थी। सारे पन्ने खाली हैं, मैंने खुद देखे, एक-एक उलटकर। सिर्फ़ आख़िरी पन्ने पर बाबू हरनाम की मुहर है और नीचे मेरा नाम — मीरा जोशी — और आगे कुछ नहीं, एक खाली जगह जहाँ तारीख़ कभी थी।
रिया को नींद आ रही है। वह रजिस्टर बंद करके अपनी छाती पर रख लेती है।
"सो जा," मैंने कहा। "सुबह रास्ता लंबा है।"
वह आँख बंद करती है। मैं खिड़की के पास बैठी हूँ और बाहर देखती हूँ। सड़क पर दीया जल रहा है, छोटा सा, और हवा उसके पास से गुज़र रही है, बुझा नहीं रही। कमरे में स्याही की महक नहीं है। सिर्फ़ चाय की महक है, जो नीचे से आ रही है, और रिया की साँसों की आवाज़, जो सबसे पुरानी आवाज़ है जो मुझे याद है।
रजिस्टर अब भी उसकी छाती पर है, बंद, खाली पन्नों वाला। और मैं जानती हूँ कि कुछ काग़ज़ ऐसे होते हैं जिन्हें जलाया नहीं जा सकता, पर उन्हें बंद रखा जा सकता है।
मैंने दीया देखा। वह जल रहा था। पर बुझने को नहीं कह रहा था।
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