A Dark Secret – Chapter 534
"माँ!" उसने चीख़ा। "माँ, वो मुझे नहीं पहचानती!"
काजल उठ खड़ी हुई। "अमिया!"
लड़की काजल के पास दौड़ी और उससे लिपट गई। सिपाही उसे रोकने के लिए आगे बढ़े, पर मैंने हाथ उठाया।
"यह कौन है?" मैंने काजल से पूछा।
"मेरी बेटी," काजल की आवाज़ काँपी। "अमिया। मैंने इसे किसी के पास नहीं छोड़ा था, कसम से — जब मैंने इसे अंतिम बार देखा तो यह घर में थी, रोटी खा रही थी।"
लड़की ने सिर उठाया। उसकी आँखें सूजी थीं। "मैं सड़क पर थी," वह रोई। "पता नहीं क्यों। मुझे याद नहीं कैसे। कोई मुझे उठा लाया — मुझे बस यह याद है कि दीवारों पर नाम थे और मैं अपना भूल गई थी।"
रामदीन ने रजिस्टर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। मैंने वह देखा जो वह देख रहा था — अमिया के माथे पर, बालों के नीचे, स्याही का एक पतला-सा बदबूदार निशान। ठीक वैसा ही जैसा काग़ज़ों पर कुछ मिटाने के बाद बनता है।
"इसका नाम मिटाने की कोशिश हुई है," मैंने कहा। "पर पूरा नहीं मिटा। इसीलिए यह रो रही है।"
काजल ने अमिया का चेहरा हाथों में लिया। "मैं तुम्हें जानती हूँ," उसने कहा। "तू मेरी बेटी है। तेरा नाम अमिया हरनाम है। तेरी आवाज़ दो कमरे दूर से मुझे आती थी जब तू अपनी दादी से चोरी-चोरी बातें करती थी।"
अमिया ने आँखें मूँद लीं। कुछ सेकंड रुके, और फिर उसने आँखें खोलीं — और इस बार उसकी आँखों में काजल थी।
"माँ," उसने कहा, "तुमने मुझे क्या पिलाया था वो कड़वा?"
काजल हँसी। पूरी गली ने यह हँसी सुनी। यह वह हँसी नहीं थी जैसी मुझे कभी काजल से मिली थी — यह वैसी थी जैसे कोई आदमी बरसों बाद अपनी मिट्टी को छू लेता है।
अमिया ने जेब से एक रसीद निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "यह मैंने रास्ते में उठाई," उसने कहा। "गाड़ी के पहिये के नीचे पड़ी थी।"
मैंने रसीद खोली। किराए की रसीद थी, एक छोटी सी। ऊपर लिखा था — किराया मिला, गली के मकान का, बीस साल का। और नीचे, मजदूर के हस्ताक्षर की जगह, एक अँगूठे का निशान। मैंने उसे करीब से देखा। अँगूठे के निशान के अंदर, बहुत छोटे, किसी ने लिखा था — "बाबू हरनाम, रखवाला।"
"यह तुम्हारे बाप का निशान है?" मैंने काजल से पूछा।
वह झुकी। उसने अपना अँगूठा उस निशान पर रखा। मिलान वह कर रही थी जो कोई चालीस साल बाद करता है — बाप के हाथ को अपने हाथ से नापना।
"मेरा अँगूठा बड़ा है," उसने कहा। "उसका छोटा था। और देखो," उसने निशान के किनारे की तरफ़ इशारा किया, "यहाँ लकड़ी का रेशा है। वह अँगूठा नहीं, उसकी लाठी का सिरा उँगली में लिपटा हुआ था। मेरे बाप सचमुच कभी मजदूर नहीं थे — वह हमेशा बैठे रहते थे और गिनते रहते थे कि किसका नाम कहाँ है।"
अचानक मेरे हाथ में रजिस्टर हल्का लगा। बहुत हल्का। मैंने उसे उलटा पकड़ा तो एक चीज़ नीचे गिरी — टेप का एक छोटा, पुराना, प्लास्टिक का डिब्बा। रजिस्टर की जिल्द के अंदर वह बरसों से छिपा था। रामदीन ने उसे उठाया। डिब्बे पर मरियल अक्षरों में कुछ लिखा था — "बोलो मत, सुनो।"
"यह उसी की आवाज़ है," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी। "जब मैं छोटी थी, वह रात में बैठकर अपनी आवाज़ टेप में भरता था। कहता था — आदमी मरता है तो नाम मरता है, पर आवाज़ कहीं नहीं जाती।"
मैंने टेप निकाला। छोटी गली में टेपरिकॉर्डर कहाँ से आता — पर माया फरीद ने कमरे के अंदर से, तुरंत, एक पुराना टेपरिकॉर्डर उठा दिया। वह ऐसे दौड़ी जैसे उसे पहले से पता था कि यही चीज़ चाहिए।
"यह चालीस साल से खाली अलमारी में रखा था," उसने कहा। "हर महीने झाड़ती थी। पता नहीं क्यों।"
टेप घूमा। धूल जैसी आवाज़ आई, फिर खड़खड़ाहट, फिर सन्नाटा। और फिर एक आदमी बोला।
धीमी, भारी, भर्राई हुई आवाज़। बीच-बीच में खाँसी। और ऐसा बोल रहा था जैसे किसी को धमका रहा हो, कोई काग़ज़ी शपथ ले रहा हो।
"नाम पहचान है," आवाज़ बोली। "जो नाम भूल गया, वह अपनी दीवार नहीं बचा सकता। जो दीवार नहीं बचा सकता, उसका घर नहीं। मैं हर गली में रहूँगा। जिसने भी अपना नाम बेचा, उसे मुझसे पूछना होगा। और जिसने नहीं बेचा — उसके लिए मैं खड़ा रहूँगा। मेरा नाम बाबू हरनाम है। रखवाला।"
टेप रुका। अंदर से टिक-टिक आई, और फिर एक और आवाज़ — बहुत छोटी काजल की आवाज़, जो हँस रही थी और कह रही थी — "अब्बा, आप अपना ही नाम बोल रहे हो, कोई और नहीं।"
धमाका नहीं हुआ। पूरी गली एक साथ चुप नहीं हुई, और फिर एक साथ नहीं बोली। बस सब बोलते रहे, धीरे-धीरे, जैसे पहली बार बोल रहे हों। बूढ़े हरिप्रसाद ने अपनी लाठी उठाई और उसे टेपरिकॉर्डर की तरफ़ इशारा किया।
"मुझे यह आवाज़ याद है," उसने कहा। "बरसों पहले रात में सुनी थी। समझा था ख़्वाब था।"
"वह ख़्वाब नहीं था, सर," माया फरीद ने कहा। "वह वही आदमी था जो आज भी हर दीवार पर अपना नाम लिखवाता है — सिर्फ़ अपनी आवाज़ से।"
मैंने रजिस्टर में देखा। अमिया के नाम के नीचे धुँधली सी एक लाइन उभरी थी। और उस लाइन के ऊपर, एक जगह, चमकती सी स्याही में — बाबू हरनाम। रखवाला। कोई तारीख़ नहीं। कोई पता नहीं। सिर्फ़ नाम और पेशा।
"तो वह अंतिम नाम था," मैंने कहा, "जो कभी काग़ज़ पर नहीं आया।"
काजल मेरी तरफ़ झुकी। उसकी आँखें चमक रही थीं, पर हँसी नहीं। यह वह भाव था जो बरसों बाद माफ़ी से नहीं, सच से आता है।
"अवाज़ ही नहीं लिखी जाती," उसने कहा। "वह बजती है। जब तक कोई सुनता है, वह काग़ज़ पर होती है। मैंने चालीस साल सोचा कि मेरे बाप ने मुझे बेच दिया। आज पता चला, वह किसी को बेच नहीं रहा था। वह हर आवाज़ को खरीद रहा था — ताकि शहर को भूलने से रोक सके।"
मैंने रजिस्टर बंद किया। और ठीक उसी वक़्त गली के मोड़ पर एम्बुलेंस की बत्ती जल उठी — वैसे ही जैसे किसी ने धीरे से चाबी घुमाई हो।
सिपाही मेरे पास आया, हाथ जोड़े। "मैडम, अब हमें इन्हें ले जाना होगा। मजिस्ट्रेट का समय हो रहा है।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात। यह रजिस्टर मेरे पास रहेगा।"
सिपाही ने रामदीन की तरफ़ देखा। रामदीन ने कहा, "थाने में भी तो दीवारें हैं। आज कल इन पर भी कुछ उभरा होगा। तुम्हारे बच्चों के नाम देखे तुमने? जिन्हें तुम बिसरे थे?"
सिपाही की आँखें भर आईं। वह तुरंत मुड़ गया और काजल को गाड़ी की तरफ़ लेने लगा। काजल चली, पर दो कदम पर रुकी। उसने हाथ की हथकड़ी उठाई और उससे अपना सिर खुजाया — हास्यास्पद था, फिर भी पूरी गली हल्की हो गई।
"मीरा," उसने कहा, बिना मुड़े, "तुम मेरी बेटी को थोड़ी देर रख सकती हो? सिर्फ़ एक पूछताछ होनी है।"
"यह किसी और की बेटी नहीं है," मैंने कहा। "यह अब इस गली की बेटी है।"
अमिया ने काजल का हाथ पकड़ा और उसे छोड़ा। फिर वह मेरी तरफ़ आई और ठीक रिया के बगल में खड़ी हो गई, जैसे दोनों पहले से एक ही दीवार पर लिखी हुई हों।
रिया ने उसका हाथ पकड़ा। "मेरा नाम रिया है," उसने कहा। "तुम्हारी माँ ने मेरी माँ को एक बार डाँटा थ
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अमिया ने रिया का हाथ पकड़ा और उसने पहली बार अपनी आवाज़ में कुछ कहा, इतनी धीमी कि गली के शोर में डूब गई। रिया ने झुककर सुना और हँस पड़ी। मैंने बीच में नहीं पूछा कि क्या कहा। कुछ बातें दो बच्चों की रहती हैं।
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