A Dark Secret532 / 536

A Dark Secret – Chapter 532

7 min read November 6, 2026

"मालकिन," उसने कहा, "मेरा नाम अभी तक रजिस्टर में नहीं लिखा गया। मैंने यह काग़ज़ नहीं लिखा। पर अगर मेरा नाम बोलने से —"

"अभी कोई नाम नहीं बोलेगा," मैंने कहा।

"मैं तो सिर्फ़ —"

"अभी नहीं।" मैंने रजिस्टर उठाया और उसे अपनी छाती से लगाया। "आज मीरा, कल सब। आज जो हमने बोला, वह काफ़ी है।"

पर रजिस्टर ने मेरी बात नहीं सुनी।

उसका आख़िरी पन्ना, जहाँ रिया का नाम था, अपने आप बाहर की तरफ़ मुड़ा — जैसे किसी ने उसे पलटा हो — और उस पर एक नई लाइन उभरने लगी। मैंने रजिस्टर पकड़ा और उस पर झुककर देखा। स्याही अभी गीली थी और वह लिखी जा रही थी — बिना किसी हाथ के, ठीक मेरी आँखों के सामने।

एक शब्द, दो, तीन…

"यह सब मेरी गलती नहीं है।"

मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह भी पढ़ रही थी, होंठ हिला रही थी।

लाइन आगे बढ़ी।

"मैं वह हूँ जो सबसे अंदर है। मुझे नाम बोलो।"

रजिस्टर मेरे हाथ से फिसला और खुला ही रह गया। और उस पल मुझे लगा कि सीढ़ी के अंधेरे से कोई देख रहा है — कोई जो चालीस साल से इसी वक़्त का इंतज़ार कर रहा था।

॥

रजिस्टर ज़मीन पर गिरा और खुला रह गया। पन्ने अपने आप पलटने लगे — धीरे-धीरे नहीं, झटके से, एक के बाद एक, जैसे किसी को जल्दी हो किसी ख़ास पन्ने तक पहुँचने की। गली में पड़ी धूल उड़कर उन पन्नों पर बैठ रही थी और स्याही की महक हवा में फैल गई।

सावित्री रजिस्टर के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने कोई किताब नहीं उठाई, बस अपना हाथ बढ़ाया और उसने पहला शब्द बोला।

"सुशीला जोशी।"

पन्ना रुक गया। उस पर स्याही उभरी, फिर मिट गई, फिर दोबारा उभरी — जैसे कोई लिख रहा हो और कोई और मिटा रहा हो।

"पीतल गली," सावित्री ने कहा, "मकान नंबर पाँच। आवाज़ — जल्दी में बोलने वाली, हर वाक्य के आख़िर में एक शब्द काट जाता था, जैसे कोई दौड़ते हुए बात कर रहा हो।"

पन्ना फिर पलटा। एक लाइन उभरी, गाढ़ी काली, और वह टिक गई।

"फिर?" मैंने कहा।

सावित्री ने आँखें बंद कर लीं। "रोटी बेलते वक़्त भी वह काग़ज़ रखती थी चूल्हे के पास। कहती थी, पढ़ने का वक़्त नहीं है, पर नाम तो हर वक़्त याद ही रहता है।"

पन्ने पर स्याही खिंची — एक लंबी लाइन, फिर दूसरी। मैंने देखा कि रजिस्टर के किनारे से स्याही की एक बूँद ज़मीन पर टपकी और धूल में समा गई।

"सुशीला जोशी," सावित्री ने तीसरी बार बोला। इस बार नाम धीमा था, करीब-करीब फुसफुसाहट।

और रजिस्टर ने उसे ले लिया।

आख़िरी पन्ने पर सुशीला का नाम पूरा उभरा — साफ़, गाढ़ा, तारीख़ के खाने के बगल में एक ख़ाली जगह। और उसके ठीक नीचे, जैसे कोई सीढ़ी चढ़ रहा हो, सावित्री का नाम आ गया। फिर तीसरी लाइन — जहाँ रिया का नाम था।

वहाँ स्याही रुक गई।

रिया का नाम नहीं मिटा। वह पीछे खिसक गया — धुँधला, हल्का, जैसे किसी ने उसे दूर से देखा हो। मैंने झुककर देखा। नाम वहीं था, पर जैसे काग़ज़ की ऊपरी परत के नीचे चला गया हो।

"यह क्या हुआ?" मैंने पूछा।

रामदीन ने रजिस्टर की तरफ़ झाँका और उसका जबड़ा कसा। "रजिस्टर दो नाम ले चुका। तीसरे के लिए जगह नहीं बची। रिया का नाम उसने नहीं छोड़ा, पर पीछे धकेल दिया।"

"मतलब?"

"मतलब यह कि आज रिया का नाम नहीं बोला जाएगा," सावित्री ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो रुक रहा था। "रजिस्टर ने उसे पीछे कर दिया, ताकि हम उसे अभी न देख सकें।"

मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह मेरे पीछे खड़ी थी, हाथ में शालिनी का टिफ़िन, और वह रजिस्टर को ऐसे देख रही थी जैसे उसने भी वह खिसकाव देखा हो।

"माँ," उसने कहा, "मेरा नाम कोई नहीं बोल रहा। मैं खुद बोल लूँगी।"

"नहीं।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि तेरा नाम अभी धुँधला है और जो धुँधला है उसे बोलने से काग़ज़ उसे पूरी तरह खींच लेगा।" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "तेरा समय आएगा। सबसे आख़िरी में।"

तभी गली के मोड़ से गाड़ी की आवाज़ आई। एक सरकारी गाड़ी, छत पर लाल बत्ती, और उसके पीछे बलवान की जीप। गाड़ी रुकी। पिछला दरवाज़ा खुला और सिपाही ने किसी को उतारा।

काजल थी।

उसके हाथों में हथकड़ी थी, बाल बिखरे हुए, चेहरे पर पाउडर नहीं, आँखों के नीचे काला। जब वह चली तो उसके पैर सीधा नहीं पड़ रहे थे। भैरों ने अपनी जगह से एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गया।

बलवान ने उसे मेरे सामने खड़ा किया।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। वह देखा जैसे कोई दूर से कोई जाना-पहचाना चेहरा खोज रहा हो।

"मैं…" उसने कहा, और फिर रुक गई। उसने अपने हाथों की तरफ़ देखा, हथकड़ी की तरफ़, फिर गली की दीवारों की तरफ़ जिन पर स्याही में नाम उभरे हुए थे। "मुझे याद नहीं आ रहा कि मैं कहाँ थी। मुझे… मुझे अपना नाम नहीं आ रहा।"

गली में सन्नाटा। सावित्री ने रजिस्टर छोड़ा और खड़ी हो गई।

"काजल," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा, पर पहचाना नहीं।

"काजल हरनाम," मैंने कहा, थोड़ा ज़ोर देकर। "हवेली वाली गली। जिसकी आवाज़ में शहद था — जो हर किसी से 'हम तो आपके अपने हैं' कहती थी, और हर बच्चे का नाम दूसरी बार में याद रख लेती थी।"

काजल की आँखें भरकर आ गईं, और फिर उनमें कुछ लौटा — धीरे-धीरे, जैसे अँधेरे कमरे में एक-एक करके बत्तियाँ जल रही हों।

"मीरा," उसने कहा। आवाज़ टूटी हुई थी।

"हाँ।"

"मैं तुमसे नफ़रत नहीं करती थी," उसने कहा। "वह बात सच नहीं थी जो मैंने कही। मुझे अपने बाप का नाम नहीं पता था, तुम्हारा पता था।" उसने रजिस्टर की तरफ़ देखा। "इसने मेरा नाम नहीं छीना। इसने मुझे मेरे ही घर में अजनबी बना दिया।"

"तुम्हारा नाम अभी रजिस्टर में है," मैंने कहा। "तारीख़ ख़ाली है। तुमने खुद बोला था, कल।"

"जानती हो आख़िरी नाम किसका है?" उसने कहा।

मैंने एक पल सोचा। "मुझे लगता है मैं जानती हूँ।"

"मेरे बाप का," काजल ने कहा। "बाबू हरनाम। जो कभी किसी काग़ज़ पर अपने हाथ से नहीं लिखा गया। जिसका नाम सिर्फ़ उसकी आवाज़ में है।"

सावित्री ने सिर उठाया। "मेरे बाप की आवाज़ टेप में बंद है।"

"तो फिर बजाओ," काजल ने कहा। "मैं भी सुनूँगी। चालीस साल से मैं उसकी आवाज़ सिर्फ़ हुक्म की तरह सुनती रही हूँ। आज मैं उसे इंसान की तरह सुनना चाहती हूँ।"

मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। उसने अपना पुराना ट्रांजिस्टर जेब से निकाला, स्पूल निकाला, और टेप को उस पर चढ़ाया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर उसने टेप फँसाया और बटन दबाया।

ट्रांजिस्टर से पहले एक फुफकार आई, फिर सनसनाहट, और फिर आवाज़ — मोटी, भारी, घिसी हुई, पर साफ़।

"मैं हरनाम सिंह चौहान…"

आवाज़ गूँजी। गली की दीवारें उसे लौटाने लगीं। सावित्री ने आँखें बंद कर लीं।

"…इस शहर का नाम सरोज नगर नहीं है। यह मेरी बेटी का नाम था। जो मैंने इस काग़ज़ में लिखवाया, और फिर भुला दिया।"

गली में खड़े लोगों में से कोई ने धीरे से कहा — "सरोज?"

"और आज जो कोई मेरा नाम बोलेगा," आवाज़ आगे बढ़ी, "वह सिर्फ़ मेरा नाम नहीं बोलेगा। वह उस बेटी का नाम भी बोलेगा जिसे मैंने भुला दिया था। दोनों एक साथ जाएँगे।"

टेप ख़त्म हुई। ट्रांजिस्टर में एक क्लिक हुई और सन्नाटा छा गया।

मैंने रजिस्टर उठाया। आख़िरी पन्ने पर तीन लाइनें थीं — सुशीला, सावित्री, और नीचे एक ख़ाली जगह जहाँ रिया का नाम धुँधला पड़ा था। और उस जगह के नीचे एक नई लाइन उभर रही थी, बिना हाथ के, स्याही की गीली महक के साथ।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho