A Dark Secret – Chapter 279
कमरे में सौ से ज़्यादा सिर एक साथ घूमे। बेंच चरमराई।
"बलदेव सिंह," मजिस्ट्रेट ने पुकारा। "बलदेव सिंह उर्फ़ बल्लू।"
पहली बेंच पर बैठा बल्लू उठा। एक हाथ से बेंच पकड़ी, दूसरे से लाठी। उसका लंगड़ापन उस कमरे में अजीब लगा, क्योंकि वहाँ हर आदमी सीधा और चुप बैठा था, और यह आदमी आवाज़ कर रहा था। जूते की एड़ी घसीटती हुई आई। पान उसके मुँह में चल रहा था, जैसे किसी घड़ी के अंदर पुर्ज़ा चल रहा हो।
कटघरे तक पहुँचकर वो रुका। हाथ काँप रहे थे। उसकी उँगलियाँ लोहे की रेलिंग पर टिकी थीं और नाखून सफ़ेद पड़ गए थे।
"नाम?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
"बलदेव सिंह।" आवाज़ सूखी थी। "लोग बल्लू बोलते हैं।"
"काम?"
"गाड़ी चलाता हूँ। चलाता था। मोती नाम की गाड़ी थी। अब नहीं है।"
"उस रात क्या हुआ?"
बल्लू ने एक बार मुँह में पान घुमाया, फिर रेलिंग कसकर पकड़ ली।
"सरकार, मैं उस रात गाड़ी के नीचे नहीं था। मैं बाहर निकल आया था। गाड़ी पलटी, मैं दरवाज़े से बाहर गिरा, मेरी टाँग दबी, पर मैं बच गया।"
वो रुका। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो मजिस्ट्रेट के हाथों की तरफ़ देख रहा था, जैसे वहाँ से कोई रस्सी लटकी हो और वो उसे पकड़ना चाहता हो।
"पर सच ये है, सरकार," उसने कहा, "उस दिन से मैं जिंदा नहीं हूँ। मेरा साँस चल रहा है, बस इतना है।"
कमरे में किसी ने खाँसा। वो खाँसी भी बहुत तेज़ लगी।
"तुमने क्या देखा था?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
बल्लू ने गला साफ़ किया।
"मैं रात ग्यारह बजे बाईस नंबर टोल पार करके जयपुर की तरफ़ निकला था। टोल से थोड़ा आगे ढाबा है, रातरानी। मैंने वहाँ दस मिनट गाड़ी रोकी, चाय पी। फिर उठकर गाड़ी की तरफ़ आया।"
"आगे बढ़ो।"
"गाड़ी के पास एक आदमी खड़ा था।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "काली माला पहने था। भौंह पर कटा निशान था। झुककर गाड़ी के पिछले पहिये के पास कुछ कर रहा था।"
"तुमने कुछ कहा?"
"मैंने कहा, भाई, ये क्या कर रहे हो। उसने कहा, कुछ नहीं, पत्थर अटक गया था, निकाल रहा हूँ।"
"और तुमने उसे छोड़ दिया?"
"सरकार, मैंने छोड़ा नहीं।" बल्लू ने धीरे से सिर हिलाया। "मैं डर गया। उसका चेहरा ऐसा था कि सवाल पूछने का मन नहीं किया। और उसकी जेब में प्लायर था। बड़ा लाल प्लायर। वो टक टक कर रहा था, जैसे जेब के अंदर कोई चिड़िया चोंच मार रही हो।"
मैंने उस वक़्त अपनी कॉपी की तरफ़ देखा। मेरी कॉपी में भी वही लिखा था। टक टक। प्लायर। मैंने वो आवाज़ गैराज में सुनी थी, रात को, जब कालू आया था।
"ग्यारह बजकर बीस मिनट पर मैं निकला," बल्लू ने कहा। "ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर गाड़ी पलट गई। ब्रेक नहीं लगा, सरकार। पैडल पूरा नीचे गया, जैसे किसी ने नीचे से छेद खोल दिया हो।"
"तुमने पुलिस को ये बात क्यों नहीं बताई?"
बल्लू ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। फिर नीचे देखा।
"क्योंकि सरकार," उसने कहा, "अगले दिन सुबह दो आदमी मेरे घर आए। एक बोला, तेरी गाड़ी का काग़ज़ हम ले गए हैं। दूसरा बोला, तेरी माँ की दवा का बिल बकाया है या भर गया?"
कमरे में सन्नाटा हो गया।
"तीसरे दिन मुझे थाने से काग़ज़ मिला, जिसमें लिखा था कि ब्रेक फेल हुआ। कोई और ताकत नहीं थी। मेरा गैराज वाला, मेरा काम, मेरे पहिये, सब कुछ बंद हो गया। मेरा माल मेरे ही आगे के ट्रक में चढ़ गया। मैं किसके पास जाता?"
"किसी और ने तुम्हें रोका था?"
"रोकने वाली बात नहीं है, सरकार," बल्लू ने कहा। "उस रात मेरी जेब में एक मोटा लिफ़ाफ़ा भी डाल दिया गया था।"
मजिस्ट्रेट ने सिर उठाया।
"किसने डाला?"
"पता नहीं। भीड़ में सब कुछ खत्म होने के बाद, मैं अपनी गाड़ी की तरफ़ देख रहा था, तभी किसी ने पीछे से मेरी शर्ट में हाथ डालकर लिफ़ाफ़ा डाल दिया और कहा, बेटा, अब तू गाड़ी ठीक करवा, बाकी सब हम देख लेंगे। आवाज़ बहुत मीठी थी, सरकार।"
"वो लिफ़ाफ़ा कहाँ है?"
बल्लू ने अपनी झोली में हाथ डाला। एक मुड़ा हुआ मोटा भूरा लिफ़ाफ़ा निकाला, जिसके कोने पसीने से गीले हो गए थे। उसने दोनों हाथों से आगे करके सिपाही को दिया।
"मैंने इसे दो साल छुआ नहीं, सरकार," उसने कहा। "न खोला, न जलाया। रोज़ रात सोचता था, फेंक दूँ, और रोज़ रात याद आता था कि अगर मेरी गाड़ी का काग़ज़ इसमें हो तो?"
सिपाही ने लिफ़ाफ़ा मजिस्ट्रेट की मेज़ पर रखा। मजिस्ट्रेट ने उँगली से किनारा खोला। अंदर से गिने हुए नोट निकले, और एक छोटा कार्ड, जिसके कोने पर एक फीका नीला गोल निशान दबा था।
मजिस्ट्रेट ने कार्ड पलटकर देखा। कुछ नहीं बोले। कार्ड को लिफ़ाफ़े के साथ रख दिया और कोर्ट मोहर्रिर की तरफ़ सरका दिया।
देवा का वकील खड़ा हुआ।
"माई लॉर्ड, ये गवाह खुद कबूल कर रहा है कि उसने पैसे लिए थे और दो साल चुप रहा। जो आदमी चुप रहने के लिए पैसे ले, उसकी गवाही की कोई कीमत नहीं होती।"
बल्लू ने वकील की तरफ़ देखा।
"साहब," उसने कहा, "मैंने पैसे नहीं लिए थे। मेरी जेब में डाले गए थे। और मैंने उन्हें खर्च भी नहीं किया। फ़र्क़ होता है, साहब। चुप रहना एक बात है, बिक जाना दूसरी।"
वकील मुस्कुराया।
"अच्छा। तो तुम बिके नहीं थे, बस डरे हुए थे।"
"हाँ, साहब," बल्लू ने कहा। "और डर कमज़ोरी होती है, ये मुझे पता है। इसीलिए आज मैं यहाँ खड़ा हूँ। मेरी गाड़ी नहीं है, मेरा गैराज नहीं है, मेरा बैंक खाता खाली है। बस ये डर बचा है। और वो भी अब जाता है।"
मजिस्ट्रेट ने कहा, "गवाह जा सकता है। अगला।"
बल्लू जैसे ही मुड़ा, उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ नहीं बोला। बस अपना सिर एक बार हल्का सा हिलाया। जैसे कोई मज़दूर दूसरे मज़दूर को कहता है कि बोझ भारी है, पर उठाना है।
"रुक्मा देवी," मजिस्ट्रेट ने पुकारा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। रुक्मा दीदी उठीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया, फिर अपनी कमर से चाबियों का गुच्छा खोला और जुगनू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"संभाल," उन्होंने कहा। "अगर मैं भूल जाऊँ तो याद दिला देना कि ढाबे पर चूल्हा जलाना है।"
जुगनू ने गुच्छा दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई मंदिर की घंटी पकड़ता है।
रुक्मा दीदी कटघरे तक आईं। बैठने को नहीं कहा गया, वो खड़ी रहीं। उनका शरीर अदालत के कमरे में भी ढाबे जितना ही जगह ले रहा था।
"सरकार," उन्होंने शुरुआत की, "मैं हिसाब रखने वाली औरत हूँ। ग्यारह साल से एक ढाबा चला रही हूँ। जो रोटी खाता है, उसका नाम मेरी कॉपी में लिखा जाता है। जो चाय पीता है, वो भी। मैं किसी को मुफ़्त में नहीं देती, और किसी का उधार नहीं भूलती।"
"आपको क्या बताना है?"
"मेरे पति की गाड़ी पलटी थी," उन्होंने कहा। "ग्यारह साल पहले। उसी सत्ताईस तारीख़ को।"
कमरे में बेंच चरमराई। किसी ने धीरे से कहा, फिर वही तारीख़।
"मेरे पति ट्रक के पीछे छोटी गाड़ी में थे। रात का वक़्त था। गाड़ी पलटी और वो नहीं बचे। पुलिस ने काग़ज़ बनाया। हादसा लिखा।"
"आपको क्या शक है?"
"शक नहीं, सरकार, काग़ज़ है।" रुक्मा दीदी ने अपनी झोली से एक पीला लिफ़ाफ़ा निकाला, जो कोनों से फटा हुआ था और जिस पर धूल की परत जमी थी। "ये मुझे उस रात के तीसरे दिन मिला था।"
"किसने दिया?"
"एक गाड़ी आई थी, सरकार। शीशा नीचे हुआ और अंदर से एक मीठी आवाज़ बोली, दीदी, दुकान आज सुबह बंद कर देना। मैंने शक्ल नहीं देखी। मैंने आवाज़ सुनी। और उस आवाज़ को मैं ग्यारह साल भूली नहीं हूँ।"
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