A Dark Secret – Chapter 277
ठक।
ठक।
कमरे में सन्नाटा।
मैंने मजिस्ट्रेट की तरफ़ देखा।
"साहब," मैंने कहा, "यही आवाज़ है। यही आवाज़ मैंने उस रात अपने गैराज में सुनी थी, जब आग लगी थी। यही आवाज़ मैंने बाईस नंबर टोल के चौराहे पर सुनी थी, जब ये मुझे रोक रहा था। यही आवाज़ उस आदमी की जेब से आ रही थी जिसने मेरे पापा की गाड़ी की केबल काटी थी।"
"ये झूठ है," कालू ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार चढ़ी। "ये प्लायर मेरा पुराना है। मैं कई साल से इसे रखता हूँ। जिसके हाथ में भी ये जाए, ये बजेगा। इससे क्या साबित होता है?"
मजिस्ट्रेट ने कुछ सोचा।
"कुछ और सबूत है?" उन्होंने मुझसे पूछा।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
नैना उठी।
"साहब," उसने कहा, "मेरे पास एक रिकॉर्डिंग है।"
कालू ने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा वो नहीं था जो अभी था। इसमें अब वो चीज़ आ गई थी जिसे लोग हिम्मत कहते हैं — नहीं, इसमें वो चीज़ आ गई थी जिसे लोग कमी कहते हैं। गिरने से पहले का खालीपन।
"ये रिकॉर्डिंग इसी आदमी की आवाज़ में है," नैना ने कहा। "और इसमें उसने एक नाम लिया है।"
"सुनाइए," मजिस्ट्रेट ने कहा।
नैना ने अपना पुराना काला फ़ोन निकाला। चार्जर कैसे निकलेगा, ये उसे पता था। उसने तार निकाली, शीशे पर स्याही से पर्दे की तरफ़ देखा, फिर फ़ोन मजिस्ट्रेट की मेज़ पर रख दिया।
कुछ पल की खामोशी। फिर एक हल्की सी फुहार। फिर एक आवाज़।
कालू की आवाज़।
"भाई साहब का कहना है, अब रुको मत। जो फ़ाइल उसके पास है, वो आठ तारीख़ तक आएगी। उसके बाद हम देखेंगे। तू इधर-उधर मत घूम। भाई साहब का आदमी हर जगह है।"
फिर उसी रिकॉर्डिंग में मेरी आवाज़ आई — "भाई साहब से कह दो, मेरी गाड़ी भी वहीं खड़ी है।"
और कालू — "तेरी गाड़ी से खून टपकेगा। भाई साहब का हुक्म है — काग़ज़ नहीं, आदमी निपटाओ।"
रिकॉर्डिंग रुकी।
कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ बची। तीसरा पंखा जो हर चक्कर पर हल्की चीख़ छोड़ता था, वो आज सबसे तेज़ सुनाई दे रहा था।
मजिस्ट्रेट ने कालू की तरफ़ देखा।
"ये आवाज़ तुम्हारी है?"
कालू ने कोई जवाब नहीं दिया।
"मैंने पूछा — ये आवाज़ तुम्हारी है?"
कालू का सिर हिला।
"बोलिए।"
"जी साहब," उसने धीरे से कहा।
"ये भाई साहब कौन हैं?"
कालू ने कोई जवाब नहीं दिया।
"मैंने पूछा कौन हैं भाई साहब?"
और कालू का आख़िरी बचा हुआ गढ़ टूट गया।
उसने अपना सिर नीचे किया। उसके कंधे झुक गए। उसने एक हाथ मेज़ की लकड़ी पर रखा — मजिस्ट्रेट की लकड़ी वाली मेज़ पर — और उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।
"देवा भाई," उसने कहा। "देवेंद्र ठाकुर। वो भाई साहब हैं।"
कमरे की हवा एक पल के लिए पत्थर बन गई।
मैंने देवा की तरफ़ देखा। वो नहीं हिले। उनका चेहरा वैसा ही था। लेकिन उनके वकील की कलम थम गई थी, मेज़ के काग़ज़ पर एक काली लकीर बन गई थी।
"हाँ," कालू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने मोती की केबल काटी थी।"
कमरे में कुछ लोग खड़े हो गए। एक बूढ़ा ड्राइवर जो पहली कतार में बैठा था, उसने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया।
मजिस्ट्रेट ने हाथ उठाया।
"चुप।"
फिर कालू की तरफ़।
"विस्तार से बताइए।"
कालू ने आँखें बंद कर लीं।
"साहब, उस रात मुझे बोला गया था कि सिर्फ़ एक केबल ढीली करनी है। बस इतना। दो हज़ार रुपये मिले थे। मुझे नहीं पता था कि इससे कोई मरेगा। मुझे लगा था कि ट्रक रुक जाएगा, चालक उतरेगा, गाड़ी के नीचे देखेगा, और मामला गुज़र जाएगा।"
"किसने बोला था?"
"मंसूर अली ने।"
और ये नाम कमरे में पहली बार इस तरह गिरा। जैसे छत से पत्थर गिरा हो। कुछ लोगों ने नाम पहले सुना था — नैना ने, मैंने, रुक्मा ने — पर बाक़ी सैकड़ों लोगों के लिए ये नाम नया था।
"मंसूर अली कौन है?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
"वो… वो साहब जो काग़ज़ लाते हैं, लिफ़ाफ़े लाते हैं, चाबियाँ रखते हैं। वो देवा भाई के लिए काम करते हैं। लेकिन साहब…" कालू की आवाज़ धीमी हो गई। "मुझे लगता है वो देवा भाई के लिए भी नहीं, किसी और के लिए करते हैं।"
मजिस्ट्रेट ने कलम मेज़ पर रखी।
"ये बात आप अभी क्यों बता रहे हैं?"
"क्योंकि साहब," कालू ने कहा, और मुझे लगा कि वो सच में काँप रहा है, "मैं हर रात अपनी आँख बंद करके सोचता हूँ कि उस रात मैंने क्या देखा था। और मैं वो भूल नहीं पाता।"
मजिस्ट्रेट ने उसकी तरफ़ झुककर देखा।
"आपने क्या देखा था?"
कालू ने एक लंबी साँस ली।
"मैंने केबल काटी और कीचड़ में भाग गया। मैं उस जगह से बारह-तेरह कदम दूर था, साहब। और मैंने पीछे मुड़कर देखा।"
"और?"
"मैंने देखा कि गाड़ी के नीचे कोई और है।"
कमरे में काफ़ी देर कोई नहीं बोला।
"कौन?" मजिस्ट्रेट ने पूछा।
कालू ने सिर उठाया। और उसकी आँखें सीधे भीड़ के पीछे की तरफ़ गईं।
"वो साहब," उसने धीरे से कहा, "जो आज यहाँ आए हैं।"
मैंने अपना सिर घुमाया।
भीड़ के पीछे, सबसे आख़िरी बेंच के पास, चाचा खड़े थे।
चाचा।
उनका चेहरा सफ़ेद था। वो कुछ नहीं बोले। उनका हाथ अपनी जेब पर था — उसी जेब पर जो मैं जानता था, जो हमेशा नोटों से भरी रहती थी और आज बिल्कुल खाली थी।
कालू ने कहा, "मैंने उन्हें गाड़ी के नीचे देखा। घुटनों के बल। और मैंने सोचा कि ये साहब लाइन ही ठीक कर रहे हैं। मुझे लगा कि मेरे बाद किसी और को भी यही काम मिला है।"
चाचा की आँखें मेरी तरफ़ उठीं।
बहुत धीमी।
फिर ज़मीन पर गईं।
"मैंने सोचा," कालू ने कहा, "कि मेरे जैसा ही कोई और मज़दूर है। पर साहब, उनके हाथ में कुछ नहीं था। उन्होंने कुछ नहीं पकड़ा हुआ था। वो बस घुटनों के बल वहीं बैठे थे।"
और अब कमरे का सन्नाटा अलग था।
ये वो सन्नाटा नहीं था जो हड़ताल में होता है, जो टोल पर होता है। ये वो सन्नाटा था जो आदमी के अंदर बैठ जाता है जब वो समझ जाता है कि कोई कहानी जितनी सुनी थी, उससे ज़्यादा बड़ी है।
देवा के वकील खड़े हुए।
"साहब," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ पहले से थोड़ी तेज़ थी। "ये गवाह खुद मुजरिम है। इसकी बात का कोई मोल नहीं—"
"बैठिए," मजिस्ट्रेट ने कहा। "पहले मैं गवाह से सवाल करूँगा।"
वकील बैठ गया। धीरे से। ऐसे जैसे कोई अपनी ही चीज़ रखकर नीचे बैठता है।
मजिस्ट्रेट ने कालू की तरफ़ देखा।
"आपने कहा कि मंसूर अली ने कहा था। तो मंसूर अली के ऊपर कौन है?"
कालू ने अपनी गर्दन पकड़ी। उसकी उँगलियाँ उस काली माला पर गईं जो गले में थी, और एक पल वो उसे धीरे से खींचता रहा।
"साहब, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि जब साहब का फोन आता है तो मंसूर अली बहुत जल्दी बोलने लगते हैं। कभी कभी वो फोन रखकर दो मिनट तक अपने कमरे में चुप बैठे रहते हैं। मैंने एक बार उनसे पूछा था कि साहब क्या कह रहे थे। उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा और कहा कि जो लिफ़ाफ़ा तेरे हाथ में आए, वो सौंपकर चला जा। सवाल मत पूछ।"
"क्या कभी कोई नाम आया? कोई काग़ज़? कोई चाबी?"
कालू काँप गया।
उसने सिर नीचे किया।
"चाबी तो साहब…" उसकी आवाज़ फिसली, "चाबी तो आज भी लोगों के सामने गिरी है।"
"क्या?"
"मंसूर अली," कालू ने कहा, और मुझे लगा कि वो अब सिर्फ़ बोल रहा है, कुछ छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा, "आज भीड़ में थे। साहब, मैंने उन्हें बेंच के पीछे देखा था। जब आपने नाम लिया — कोई नाम, कोई नाम नहीं — जब साहब यहाँ बोल रहे थे, तब मंसूर अली ने अपनी जेब में हाथ डाला और कुछ ज़मीन पर गिरा दिया।"
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