A Dark Secret152 / 536

A Dark Secret – Chapter 152

7 min read November 6, 2026

रास्ते में सड़क खाली थी। सुबह के छह बजे ट्रांसपोर्ट नगरी उस आदमी जैसी लगती है जो रात भर पीकर अब नींद में करवट ले रहा है। कुछ ट्रक खड़े थे, इंजन बंद, धूल में लिपटे। एक कुत्ता एक टायर के पास सो रहा था और मेरे पैरों की आवाज़ पर कान हिलाकर फिर सो गया।

रातरानी ढाबा पहुँचा तो शटर आधा उठा था।

अंदर से चूल्हे की आवाज़ आ रही थी। रुक्मा दीदी की आवाज़ आ रही थी। और किसी तवे पर कुछ पक रहा था जिसकी खुशबू सड़क तक आ रही थी।

मैं अंदर गया।

"अरे, आज बड़े सुबह-सुबह?" रुक्मा दीदी ने कड़ाही से आँख हटाए बिना कहा। "रात सोया कि नहीं, या छत पर बैठकर पूरी रात तारे गिनता रहा?"

"सोया, दीदी। तीन घंटे।"

"तीन घंटे।" उसने मुँह बनाया। "तीन घंटे सोना नहीं होता, अर्जुन। तीन घंटा तो वो सोता है जो ट्रक में बैठकर आँख झपकाता है। तू आदमी है। आदमी को पूरी रात चाहिए।"

"दीदी, मुझे नैना से मिलना है।"

"वो पीछे बैठी है। नीम के नीचे। उसने भी सुबह की चाय पी है और तीन बार तेरे बारे में पूछ चुकी है।"

मैं रुका।

"तीन बार?"

"तीन बार।" रुक्मा दीदी ने कड़ाही से एक रोटी निकाली और सूखे कपड़े पर रखी। "और मैंने तीनों बार कहा कि आएगा। लड़की है, पर बेवकूफ़ नहीं है। उसे पता है तू आएगा। वो बस ये देख रही है कि तू कितनी देर लगाता है।"

मैं ढाबे के पीछे गया।

नीम का पेड़ सुबह की रोशनी में और बड़ा लग रहा था। उसके नीचे उल्टा ढोल रखा था, और उस पर नैना बैठी थी। फटा बैग गोद में, कैमरा बगल में, और चश्मा नाक पर सरका हुआ।

उसने मुझे देखते ही चश्मा ऊपर धकेला।

"तू आ गया।"

"तू पूछ रही थी।"

"मैं पूछ रही थी कि तू आएगा या नहीं, ये नहीं कि तू कब आएगा।" उसने बैग से एक काग़ज़ निकाला और उसे ढोल पर रख दिया। "बैठ। बता।"

मैं बैठ गया।

और मैंने कुछ नहीं कहा।

बस जेब से वो पीली पर्ची निकाली और उसके सामने रख दी।

नैना ने उसे देखा। फिर मुझे देखा। फिर पर्ची को उठाया।

"ये कहाँ से?"

"चाचा के कोट से गिरी। रात।"

"तूने उन्हें दिखाया?"

"देख लिया था। मैंने जेब में डाल दी। जानबूझकर।"

नैना ने मुँह बनाया — वो वाला मुँह जो कहता है कि तू पागल है, पर मैं अभी तुझसे बहस नहीं करूँगी — और पर्ची को दोनों हाथों से पकड़कर सूरज की तरफ़ की।

"मुहर घिसी है। ठाकुर ट्रांसपोर्ट।"

"मैंने भी पढ़ा।"

"डीज़ल…" उसने आँखें सिकोड़ीं। "नब्बे लीटर।"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"नब्बे लीटर।" उसने पर्ची मेरी तरफ़ घुमाई। "यहाँ लिखा है। नब्बे।"

मैंने देखा।

और मैंने देखा कि मैंने रात में जल्दबाज़ी में ग़लत पढ़ा था। मैंने "तीन सौ बीस" पढ़ लिया था, पर मुहर के नीचे जो लिखा था वो और था — ये पर्ची किसी दूसरी गाड़ी की थी, और उस पर डीज़ल नब्बे लीटर लिखा था।

"नब्बे लीटर," मैंने धीरे कहा।

"हाँ।" नैना ने पर्ची नीचे रखी। "और ये नामुमकिन है।"

"क्यों?"

"क्योंकि ठाकुर ट्रांसपोर्ट की जो गाड़ियाँ हैं, वो सब पुरानी हैं। जो ट्रक तूने उठाया — पीला, रघुवीर — उसकी टंकी ही नहीं है। मैंने देखा था। उसकी टंकी में साठ लीटर से ज़्यादा नहीं आता। इतना ही। साठ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो पर्ची झूठी है?"

"पर्ची झूठी नहीं है, अर्जुन।" नैना ने उसे उलटकर देखा। "पर्ची सच्ची है। पर जो लिखा है वो गाड़ी में डाला नहीं गया। समझ रहा है?"

मैं समझ रहा था।

और समझना ऐसा था जैसे दीवार पर एक ईंट निकल जाए और पीछे से हवा आने लगे।

"मतलब डीज़ल के काग़ज़ पर लिखा जाता है," मैंने धीरे कहा, "और टंकी में डाला नहीं जाता।"

"और नीचे लिखा है — रास्ते का नुक़सान, एक लाख पचास हज़ार।" नैना ने पर्ची को मेरी तरफ़ धकेला। "ये काग़ज़ किसी ड्राइवर का टोल-पर्चा नहीं है। ये बीमा दफ़्तर जाने वाला काग़ज़ है।"

मैंने पर्ची को अपनी कॉपी में रखा।

और फिर मैंने सिर उठाया और ढाबे की तरफ़ देखा, जहाँ अब ड्राइवर आने शुरू हो गए थे। कुछ चाय ले रहे थे, कुछ रोटी, कुछ बस बैठे थे और पान चबा रहे थे।

"एक ड्राइवर से पूछना होगा," मैंने कहा।

"कोई बोलेगा?"

"देखते हैं।"

ढाबे के पीछे, नीम से आगे, एक खुली जगह थी जहाँ ट्रक वाले रुकते थे और चारपाइयाँ पड़ी थीं। वहाँ एक आदमी अकेला बैठा था। चालीस-पैंतालीस का होगा। पसीने से भीगी शर्ट, हाथ में रोटी का टुकड़ा, और सामने मिट्टी का कटोरा जिसमें दाल थी।

मैं उसके पास गया।

"भाई साहब।"

उसने सिर उठाया। देखा। फिर नीचे देखकर रोटी तोड़ने लगा।

"चाय पीनी है तो अंदर जा," उसने कहा।

"चाय नहीं चाहिए।"

"तो फिर?"

मैं उसके सामने वाली चारपाई पर बैठ गया।

"आपका नाम?"

वो रुका।

"भोला।"

"भोला भाई, आप ठाकुर ट्रांसपोर्ट की गाड़ी चलाते हो?"

रोटी तोड़ने वाले उसके हाथ रुक गए। एक पल के लिए। बस एक पल।

फिर वो फिर तोड़ने लगा।

"कौन बोला?"

"कोई नहीं बोला। मैंने अंदाज़ा लगाया।"

"ग़लत लगाया।"

"आपकी शर्ट पर ठाकुर ट्रांसपोर्ट की मुहर का नीला धब्बा है। कंधे पर। जैसे रसीद जेब में रखी हो और वो भीग गई हो।"

भोला ने अपने कंधे की तरफ़ देखा। अपने आप। फिर उसने नज़र नीचे कर ली।

"तू कौन है?"

"मेरा नाम अर्जुन है।"

"अर्जुन…" उसने एक पल सोचा और फिर उसके चेहरे पर कुछ चला। "वो अर्जुन? जिसने पीला ट्रक उठाया?"

"हाँ।"

उसने दाल में रोटी डुबोई और मुँह में डाली। चबाया। निगला। फिर बोला —

"तो सुन अर्जुन। पीला ट्रक उठाना आसान था। उसे चलाना आसान है। उसका नाम आगे लिखवाना आसान है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर जो सवाल तू पूछ रहा है, वो आसान नहीं है।"

"मुझे आसान सवाल नहीं पूछने।"

भोला हँसा। छोटी, थकी हुई हँसी।

"तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे।"

मैं सीधा हो गया।

"आप मेरे पापा को जानते थे?"

"मैंने उनके साथ एक साल गाड़ी चलाई है।" भोला ने रोटी का आख़िरी टुकड़ा मुँह में डाला और हाथ साफ़ किया। "रघुवीर भाई। अच्छे आदमी थे। बहुत अच्छे। और यही उनकी सबसे बड़ी ग़लती थी।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"अच्छे आदमी को इस धंधे में दो ही चीज़ें मिलती हैं," भोला ने कटोरा एक तरफ़ सरकाया। "या तो उसे बर्बाद कर दिया जाता है, या उसे चुप करा दिया जाता है।"

"आप चुप हैं?"

वो रुका।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत दिनों से कुछ पी रहा हो और कोई पूछ ले कि क्या पी रहे हो।

"मैं चुप हूँ," उसने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि मेरे तीन बच्चे हैं।" उसने उँगली उठाई। "और ये जो तू पूछ रहा है ना, ये सवाल पूछने वाले आदमी के बच्चों को कोई नहीं पूछता कि तुम्हारा खाना कौन देगा।"

ढाबे की तरफ़ से आवाज़ आई।

"भोला! रोटी और ले!"

भोला ने हाथ उठाया और सिर हिलाया। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तू क्या पूछना चाहता है?"

मैंने पर्ची जेब से निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ाई।

"ये पर्ची। डीज़ल नब्बे लीटर। पर गाड़ी की टंकी में साठ से ज़्यादा नहीं आता।"

भोला ने पर्ची देखी। बहुत देर तक देखी।

फिर उसने उसे छुआ तक नहीं।

"ये मेरी नहीं है," उसने कहा।

"मैंने कहा नहीं है। मैं पूछ रहा हूँ कि ऐसी पर्ची क्यों बनती है।"

भोला ने चारों तरफ़ देखा। फिर वो मेरे और नैना के बीच में झुककर बैठ गया और उसकी आवाज़ वैसी हो गई जैसी आवाज़ होती है जब कोई अपने ही कान के लिए बोल रहा हो।

"ठाकुर ट्रांसपोर्ट में हर महीने एक हिसाब बनता है। हर गाड़ी के नाम पर डीज़ल भरवाया जाता है, काग़ज़ पर। और काग़ज़ पर भरवाने का मतलब होता है कि असली डीज़ल कहीं और गया।"

"कहाँ?"

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