A Dark Secret142 / 299

A Dark Secret – Chapter 142

7 min read November 6, 2026

"मतलब वो और लिखने वाले थे?"

"या वो और लिखने से पहले रुक गए। क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि अब लिखने का वक़्त नहीं है।"

मैंने रजिस्टर उठाया और बनियान में लपेटने लगा।

"तू कहाँ जा रही है?" मैंने पूछा।

"मैं तो तेरे साथ हूँ।"

"मैंने अभी कुछ कहा नहीं।"

"तूने कहा।" उसने अपना फटा बैग कंधे पर चढ़ाया। "तेरे चेहरे ने कहा।"

मैंने रजिस्टर सीने से लगाया।

"नैना," मैंने कहा, "आठ बजे रुक्मा दीदी ढाबे पर ड्राइवरों के सामने सब बताने वाली हैं। और कबीर नौ बजे काँच के दफ़्तर के फाटक पर पहुँचने वाला है।"

"तो?"

"तो मुझे एक चीज़ चाहिए।"

"क्या?"

"चाचा।"

वो एक पल रुकी।

"अगर वो लौटे," मैंने कहा, "तो मैं उनसे सीधे पूछूँगा। नाम नहीं पूछूँगा। सिर्फ़ ये पूछूँगा — उस रात तुम्हारे जूतों में कीचड़ कहाँ से आया था।"

और मैंने सीढ़ी की तरफ़ कदम बढ़ाया।

पर पहला कदम रखते ही मैं रुक गया।

क्योंकि मेरे कान में एक आवाज़ आई थी।

नीचे, गली के मोड़ पर, किसी गाड़ी का इंजन बंद हुआ था — और वो आवाज़ मैंने पहले भी सुनी थी। फटा मफ़लर। जैसे बूढ़े आदमी की खाँसी। वो बोलेरो।

मैंने नैना की तरफ़ देखा।

उसने भी सुना था।

"अर्जुन," उसने धीरे से कहा, "वो गाड़ी…"

"हाँ," मैंने कहा। "वो वही है।"

और नीचे, गली में, किसी ने बहुत मीठी आवाज़ में पुकारा —

"अर्जुन बेटा! ऊपर हो? मैं तुम्हारा चाचा लेकर आया हूँ।"

॥

"अर्जुन बेटा! ऊपर हो? मैं तुम्हारा चाचा लेकर आया हूँ।"

आवाज़ इतनी मीठी थी कि एक पल के लिए मैं सच में मान गया। जैसे कोई बड़ा आदमी नीचे खड़ा हो, हाथ में चाय का गिलास हो, और मेरे चाचा उसकी गाड़ी में बैठे मुस्कुरा रहे हों।

पर मैंने उसी पल अपनी कलाई देखी। पापा की घड़ी। पाँच मिनट आगे।

मेरी आदत है — जब दिल कहे कि दौड़ो, तब घड़ी देख लेना चाहिए।

"नैना," मैंने कहा, "तू पीछे रह।"

"मैं पीछे नहीं रहती।"

"तो फिर सीढ़ी पर रुक। मेरे एक कदम पीछे।"

वो मेरे एक कदम पीछे रुकी। बस।

मैं सीढ़ी से नीचे उतरा। लोहे की सीढ़ी थी, हर कदम पर बजती थी। मैंने जानबूझकर धीरे उतरना चुना, ताकि नीचे वाला सुन ले कि मैं आ रहा हूँ। जो आदमी चुपके से आना चाहता है, वो सीढ़ी पर पैर नहीं रखता — वो ऊपर सोते हुए आदमी के सिरहाने आ जाता है।

गली में एक बोलेरो खड़ी थी। धूल से ढकी, आगे का बंपर टेढ़ा, और इंजन खुला हुआ — वो फटी मफ़लर वाली आवाज़, जैसे बूढ़े आदमी की खाँसी। मैंने वो आवाज़ पहले सुनी थी, जिस दिन फाइल वाला आदमी ढाबे पर आया था।

गाड़ी के पास एक आदमी खड़ा था। पतला, सफ़ेद शर्ट, कमर पर बेल्ट, हाथ में मोबाइल। उम्र पचास के आसपास। चेहरे पर वो हँसी जो सामने वाले को बैठा देती है।

"अर्जुन बेटा," उसने दोनों हाथ जोड़ लिए, "बड़ी मुश्किल से तुम्हारा पता मिला।"

मैंने उसकी गाड़ी की तरफ़ देखा। पिछला शीशा साफ़ नहीं था, धूल की परत जमी थी। अंदर कोई नहीं बैठा था।

"चाचा कहाँ हैं?" मैंने पूछा।

"वो…" उसने गाड़ी की तरफ़ हाथ किया, "वो रास्ते में उतर गए। कहा कि तुमसे मिलकर आते हैं। मैंने कहा, चाचा जी, मैं पहुँचा देता हूँ। पर वो नहीं माने।"

"कहाँ उतरे?"

"वो… थोड़ा आगे। पुल के पास।"

मैंने कान लगाया। बोलेरो का इंजन गरम था — धातु अभी ठंडी नहीं हुई थी, और मफ़लर के जोड़ से एक हल्की फुंफकार आ रही थी जो सिर्फ़ गरम इंजन में होती है। मतलब ये गाड़ी अभी चलकर आई है, दूर से आई है।

पर उस आदमी की आवाज़ में वो हल्की कंपन थी जो झूठ बोलते वक़्त आती है। मैंने सीखा है कि ये कंपन हर बार झूठ नहीं होती — कभी-कभी अच्छे लोग भी डर से काँपते हैं। इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।

"बेटा," उसने आवाज़ और मीठी की, "तुम्हारे चाचा ने एक बात कही थी।"

"कहिए।"

"कि जो चीज़ उनकी नहीं है, वो वापस कर दो। फिर वो घर लौट आएंगे। बिल्कुल सही सलामत।"

गली में एक कुत्ता भौंका। दूर कहीं किसी ने ट्रक स्टार्ट किया, और वो आवाज़ आकर इस छोटी गली में दब गई।

"आठ बजे तक सोच लो," उसने कहा। "मैं यहीं आसपास हूँ।"

"आपका नाम क्या है?" मैंने पूछा।

वो हँसा। "नाम से क्या होता है बेटा? नाम तो बदल जाते हैं। काम देखो।"

और वो गाड़ी में बैठा।

मैं वहीं खड़ा रहा, और जब उसने इंजन स्टार्ट किया, मैंने आँख बंद कर ली। मफ़लर की फटी आवाज़, बगल के पहिये की बेयरिंग में एक हल्की घरघराहट — जैसे अंदर कोई छोटा पत्थर बंद है — और गियर बदलते वक़्त एक छोटी सी चटक। तीन आवाज़ें। तीनों मैंने याद रखीं।

गाड़ी मुड़ी और गली से निकल गई।

"अर्जुन," नैना ने पीछे से कहा, "ये जाल है।"

"हाँ।"

"तो तू इतना शांत क्यों है?"

मैंने सीने पर हाथ रखा। बनियान में लिपटा रजिस्टर वहीं था, ठंडा, भारी।

"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर मैं अभी गुस्सा हो जाता, तो मैं इस गाड़ी के पीछे भागता। और फिर मुझे कोई नहीं बताता कि चाचा कहाँ हैं। जो आदमी इतनी मीठी आवाज़ में धमकी देता है, वो भागते हुए आदमी को पसंद करता है। खड़े आदमी से उसे दिक्कत होती है।"

नैना ने अपना फटा बैग कंधे पर ठीक किया।

"आठ बजे," उसने कहा। "रुक्मा दीदी भी आठ बजे बोलने वाली हैं।"

"देख," मैंने कहा, "आज सुबह सब कुछ आठ बजे पर आकर रुक रहा है। जैसे किसी ने घड़ी देखकर पूरा दिन सेट किया हो।"

हम गली से निकले।

सुबह के सात बजकर पैंतालीस मिनट। सूरज टीन की छतों पर चढ़ चुका था, और ट्रांसपोर्ट नगरी की हवा में वो गर्मी थी जो कहती है कि आज दिन लंबा जाएगा।

रास्ते में एक बात मेरे दिमाग़ में चल रही थी, जो मुझे छत पर बैठे हुए आई थी और अब भी नहीं छोड़ रही थी — कि मेरे पापा ने रजिस्टर इसलिए रखा था कि कोई और शिकायत कर सके।

और जब पापा ने आख़िरी लाइन में "किसने कहा" खाली छोड़ा, तो वो खाली नहीं छोड़ा था। वो उस आदमी का नाम जानबूझकर नहीं लिखा था, क्योंकि वो जानते थे कि जो काग़ज़ उनके पास है, अगर उनके हाथ में पकड़ा गया, तो नाम होने से जान खतरे में पड़ेगी। उन्होंने नाम की जगह एक अक्षर छोड़ा — "म"। ताकि अगर रजिस्टर किसी और के हाथ लगे, तो वो पूरा नाम न पढ़ सके।

ये सोचकर मेरा गला सूख गया।

क्योंकि "म" से मेरे चाचा का नाम शुरू होता है।

पर "म" से एक और नाम भी शुरू होता है — मल्होत्रा। बीमा दफ़्तर वाला सुरेश मल्होत्रा।

मैंने नैना से ये नहीं कहा। अभी नहीं।

रातरानी ढाबे का शटर नीचे था।

ये अजीब था। सुबह आठ बजे ढाबा खुला होना चाहिए। ड्राइवर बाहर खड़े थे, कोई बेंच पर बैठा था, कोई सिगरेट पी रहा था, कोई ट्रक के पहिये के पास बैठकर चाय माँग रहा था। पर शटर बंद था और भीतर से रोशनी की पतली लकीर आ रही थी।

मैंने शटर पर तीन बार थपथपाया। दो लंबे, एक छोटा।

भीतर से कुंडी खुलने की आवाज़ आई, फिर शटर एक हाथ भर उठा, और रुक्मा दीदी का चेहरा दिखा।

"अंदर आ," उन्होंने कहा। "और जल्दी।"

मैं झुककर अंदर गया। नैना मेरे पीछे।

ढाबे के अंदर अंधेरा था। बत्ती जल रही थी, पर वो बड़ी बत्ती नहीं थी — पीछे वाली छोटी बत्ती, जो कड़ाही के ऊपर लगी है। उसकी रोशनी में बेंचें, मेज़, और कोने में रखा आटे का ड्रम सब पीले दिख रहे थे।

रुक्मा दीदी ने शटर फिर नीचे कर दिया। धीरे से, आवाज़ किए बिना।

अंदर पहले से तीन लोग बैठे थे।

टीटू। कोने वाली बेंच पर, घुटने सीने से लगाए, हाथ में वही फटा थैला जिसमें सूखी रोटियाँ रहती हैं। उसने मुझे देखा और आँखें नीची कर लीं।

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