A Dark Secret – Chapter 140
"अम्मा की दवा — हर तीसरे महीने। सिमरिया से लानी पड़ती है, यहाँ नहीं मिलती। पैसा ज़्यादा लगता है, पर क्या करें।"
फिर।
"बाईस नंबर का हिसाब। महीने के आख़िर में मिलाना। एक हज़ार दो सौ का फ़र्क़ आता है हर बार। पूछा तो कहते हैं गिनती में गड़बड़। गिनती कभी ग़लत नहीं होती, बंदा ग़लत होता है।"
फिर।
"बल्लू का टायर। तीन जगह से कटा। किसी ने काटा है। बल्लू डरता है, बोलता नहीं। मैं बोलूँगा, पर सबूत पहले।"
मेरा गला सूख गया।
बल्लू।
बल्लू का टायर।
ये रजिस्टर दस साल पुराना है। और इसमें बल्लू का नाम है। मोती से पहले, किसी और गाड़ी का। कोई और टायर।
मैंने रजिस्टर को गोद में रखा और आसमान की तरफ़ देखा।
छत के ऊपर तारे नहीं थे। बस धुआँ था, धूल थी, और उसके पीछे एक हल्की लाल रोशनी — शहर का सोडियम लैंप, जो रात भर जलता रहता है, जैसे कोई बूढ़ा आदमी आँखें खोलकर बैठा हो और कहे, मैं सोया नहीं हूँ, तुम भी मत सोना।
मैंने पूरी रात पढ़ा।
हर पन्ना।
हर लाइन।
और हर लाइन के आगे वही दो अक्षर।
कभी पूरा नाम — ठाकुर।
कभी सिर्फ़ — ठा।
और कभी, किसी किसी लाइन में, बहुत छोटा, बहुत दबाया हुआ, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँपा हो — दे।
मैंने पहले सोचा कि "दे" किसी और चीज़ का छोटा रूप है। देना। देना है। कोई हिसाब की बात।
पर फिर मैंने तीन पन्ने उलटकर देखे।
हर जगह, जहाँ "ठा" था, वहाँ से ठीक एक पन्ना पीछे "दे" था।
जैसे कोई लिखते-लिखते डर जाता हो।
जैसे कोई आधा नाम लिखे और फिर सोचे, नहीं, इतना भी ज़्यादा है।
मैंने क़लम उठाया — टूटा हुआ पेंसिल का टुकड़ा था, जो मेरी जेब में हमेशा रहता है — और रजिस्टर के पिछले खाली पन्ने पर लिखा।
दे।
ठा।
देवेंद्र।
ठाकुर।
और मैंने पेंसिल नीचे रख दी, क्योंकि मेरे हाथ में अब ताक़त नहीं बची थी।
देवा भाई। भाई साहब। वो आदमी जो हर किसी को बेटा कहता है। जो चाय पिलाता है। जो मुस्कुराता है। जो कहता है, अर्जुन बेटा, तेरे पापा अच्छे आदमी थे, भगवान उन्हें अपने पास रखे।
हर लाइन के आगे उसका नाम था।
हर लाइन के आगे।
सिर्फ़ एक खाली लाइन के सिवा।
आख़िरी लाइन।
जिसमें "किसने कहा" का खाना खाली था।
मैंने सुबह होते देखी।
पहले अंधेरा हल्का ग्रे हुआ। फिर ग्रे में पीला घुला। फिर नीचे किसी ने कड़ाही गरम की और तेल की महक ऊपर तक आई — चाची कुछ तल रही थीं, शायद पूरी, शायद पराठा, जो भी हो, उसमें मेरी भूख से ज़्यादा उनकी फ़िक्र थी।
मैंने रजिस्टर को बनियान में लपेटकर सीने से लगाया और दीवार से टिक गया।
थोड़ी देर बाद सीढ़ी पर चप्पल की आवाज़ आई।
मैंने सोचा चाची होंगी।
पर जो सिर उठाकर आई, वो चश्मा ऊपर धकेल रही थी।
नैना।
हाथ में चाय का गिलास, कंधे पर वही फटा बैग, और आँखों में वो नींद जो रात भर नहीं आई थी।
"तू सोया नहीं," उसने कहा।
"तू भी नहीं।"
"मैं रिपोर्टर हूँ। मेरे लिए सोना शौक है, काम नहीं।" उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले। और हाँ, चाची ने कहा कि तू रात भर ऊपर है, तो उन्होंने दो पराठे भी भेजे हैं। मैंने एक खा लिया। माफ़ करना।"
"तू कम से कम झूठ नहीं बोलती।"
"झूठ बोलने के लिए चेहरा चाहिए। मेरे पास चश्मा है, बस।"
वो मेरे पास बैठ गई। दीवार से टिकी। चाय की भाप हवा में घुल गई।
कुछ देर हम दोनों चुप रहे।
फिर उसने कहा, "दिखा।"
मैंने बनियान खोली।
नैना ने रजिस्टर देखा और उसकी साँस भारी हो गई। उसने हाथ बढ़ाया, पर छुआ नहीं। जैसे डर हो कि छूने से कुछ बदल जाएगा।
"ये वही है," उसने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"काली जिल्द। जिसे सब काली डायरी कहते हैं।" उसने चश्मा ऊपर किया। "तीन महीने से मैं इसी चीज़ के पीछे हूँ। और ये… ये तेरी छत की अलमारी में था?"
"अलमारी के पेंदे के नीचे। दूसरी लकड़ी के नीचे। तिरपाल में।"
"और चाचा?"
"लापता।"
"और चाचा को पता था?"
मैंने चाय पी। गरम थी, और उसकी गरमाहट ने मेरे गले को थोड़ा खोला।
"नैना," मैंने कहा, "चाचा तीन रात पहले छत पर आए थे। खुरचने की आवाज़ आई थी। जूतों में कीचड़ था। और जब वो लौटे तो खाली हाथ थे।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो उन्होंने रजिस्टर लिया नहीं। उन्होंने रजिस्टर छोड़ा।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि उन्होंने ऊपर वाला हिस्सा खोला — टिन, टेप, टोपी वाला हिस्सा — और रजिस्टर वाला नीचे वाला हिस्सा उन्होंने नहीं खोला। या खोला और डर गए।" उसने चश्मा फिर ऊपर किया। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर तू चाचा की जगह होता — और तेरे पास चार लोगों की तस्वीर हो, जिसमें एक चेहरा खुरचा हुआ हो — तो तू क्या करता?"
मैंने सोचा।
"मैं रजिस्टर जलाता।"
"और उन्होंने नहीं जलाया।"
"नहीं।"
"तो फिर वो चाहते क्या हैं?"
मैंने रजिस्टर खोला। पन्ने पलटे।
"ये देख," मैंने कहा।
अब हम दोनों सिर झुकाए बैठे थे। बीच में रजिस्टर खुला था। नैना के पास एक कॉपी थी और वो हर पन्ने का नंबर अपनी कॉपी में उतार रही थी।
"एक लाइन मत छोड़ना," वो कह रही थी। "हर लाइन। तारीख़, गाड़ी, रकम, और आख़िरी खाना।"
"ये तीसरा पन्ना है। इस पर दो लाइनें हैं।"
"लिख।"
"पहली — गाड़ी तीन एक नौ छह। लोहे की छड़ें। एक लाख अस्सी हज़ार। ठा।"
"दूसरी?"
"दूसरी — गाड़ी सात सात दो चार। कपड़े के बंडल। नब्बे हज़ार। दे।"
नैना ने लिखा। फिर रुकी।
"अर्जुन।"
"हाँ।"
"ये 'दे' और 'ठा' क्या हैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू खुद बोल। तुझे पता है।"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने कहा, "देवेंद्र। ठाकुर।"
"हाँ।"
"हर लाइन में?"
"हर लाइन में। यहाँ तक कि जहाँ पूरा नाम नहीं है, वहाँ भी। कभी दे, कभी ठा। जैसे लिखने वाला डरता रहा हो कि कहीं कोई पढ़ न ले।"
नैना ने अपनी कॉपी के पन्ने पर हाथ रखा।
"अर्जुन, तेरे पापा ने एक चीज़ की है जो मैंने तीन महीने में नहीं की।"
"क्या?"
"उन्होंने हिसाब रखा है।" उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "मैंने तेरह काग़ज़ जमा किए। तेरह। तीन महीने में। और वो सब बिखरे हुए हैं। किसी में तारीख़ नहीं, किसी में नाम नहीं, किसी में रकम नहीं। मैं उन्हें जोड़ नहीं पा रही थी। और तेरे पापा ने…"
वो रुक गई।
"तेरे पापा ने पूरा नक्शा बना दिया।"
दोपहर तक हमने गिनती की।
मैं बोलता जाता था, नैना लिखती जाती थी।
और धीरे-धीरे एक ऐसी चीज़ बनने लगी जिसे देखकर मेरे हाथ ठंडे हो गए।
इकतालीस।
इकतालीस लाइनें।
दस साल में इकतालीस हादसे।
और हर एक सत्ताईस तारीख़ को।
हर एक।
बिना नागा।
कभी सत्ताईस जनवरी, कभी सत्ताईस मार्च, कभी सत्ताईस जून, कभी सत्ताईस सितंबर, कभी सत्ताईस दिसंबर।
पर हर बार सत्ताईस।
जैसे किसी ने कैलेंडर उठाया हो और बोला, इस महीने के इस दिन को हम मौत के लिए रख लेते हैं।
"रुक," नैना ने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। "अब रकम जोड़।"
हमने जोड़ा।
मैंने अपनी जेब से पेंसिल का टुकड़ा निकाला। नैना ने कहा, "मेरे पास दो पेन हैं।" मैंने कहा, "अपने पास रख। मेरी पेंसिल दस साल से मेरे साथ है।"
"भावुक।"
"किफ़ायती।"
वो हँसी। पहली बार उस दिन।
फिर हमने जोड़ पूरा किया और हँसी ग़ायब हो गई।
"अर्जुन," नैना ने धीरे से कहा, "ये सिर्फ़ हादसों का हिसाब नहीं है।"
"मुझे पता है।"
"ये शहर का नक्शा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
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