A Dark Secret100 / 536

A Dark Secret – Chapter 100

7 min read November 6, 2026

नैना ने अपनी आवाज़ बहुत नरम कर ली। मैंने उसे पहले कभी इतना नरम नहीं सुना।

"टीटू, तू जानता है कि तेरा नाम कहीं नहीं आएगा? किसी काग़ज़ में, किसी अख़बार में, किसी रिपोर्ट में। मैं वादा करती हूँ।"

"वादा क्या है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और आया — गुस्सा। "मेरे यहाँ कल एक आदमी नहीं आया था, तब भी मेरा नाम था। काग़ज़ पर नहीं, याद में।" उसने अपना सिर खुजाया। "भाई साहब को सब पता है। कौन सी गाड़ी, कितनी बजे, किसके साथ। सब। मेरे यहाँ बैठकर चाय पीने वाले को भी पता है।"

"मुझे पता है," मैंने कहा। "मेरे पापा भी यहीं चाय पीते थे। और तब भाई साहब को सब पता था।"

टीटू ने मेरी तरफ़ देखा। सीधे।

"तुम रघुवीर के बेटे हो," उसने कहा। सवाल नहीं था।

"हाँ।"

"तुम दिखते नहीं हो उनके जैसे।"

"माँ कहती है, आदतें मिलती हैं, शक्ल नहीं।"

उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जिसे मैं कम पहचानता हूँ — एक लड़के की मुस्कान, जो बहुत दिनों से नहीं मुस्कुराया।

"अब सुन," मैंने कहा। "सिर्फ़ एक सवाल। और सच बोलना। अगर नहीं बोलना, तो चुप रह जाना। झूठ मत बोलना। क्योंकि झूठ बोलते वक़्त आदमी की आवाज़ में एक हल्की कंपन आती है और मैं वो सुन लेता हूँ।"

"तुम क्या हो, जादूगर?"

"नहीं। मैकेनिक हूँ।"

वो हँसा। एक छोटी, थकी हुई हँसी।

"पूछो," उसने कहा।

"काली जिल्द वाली डायरी किसके पास है?"

वो कुछ नहीं बोला।

"देख," मैंने कहा। "मैं नहीं कह रहा कि तू उसे ले आ। मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ कि किसके पास है।"

टीटू ने फिर से बाहर की तरफ़ देखा। फिर उसने अपना प्लास्टिक का थैला ज़मीन पर रखा, जेब से चाबी का गुच्छा निकाला, और उसे घुमाने लगा — जैसे उसकी उँगलियों को कुछ करना था।

"भैया," उसने कहा, "आप जानते हो मेरी दीदी कहाँ पढ़ती है?"

"नहीं।"

"सरकारी स्कूल, नौवीं।" उसने चाबी घुमाई। "फीस नहीं है। बस किताबें हैं। दो हज़ार अस्सी रुपये की। मैं देने वाला नहीं था। पैसे अपने आप आ गए। काग़ज़ के लिफ़ाफ़े में, दरवाज़े के नीचे से।"

मैं चुप रहा।

"उस दिन के बाद से," उसने कहा, "मैं हर आवाज़ पर चौंकता हूँ।"

नैना ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। मैंने देखा कि उसकी आँखों में कुछ बदल गया है।

"टीटू," मैंने कहा। "मुझे तेरे से कोई काग़ज़ नहीं चाहिए।"

वो बीच में रुका। चाबी घूमना बंद हो गई।

"मुझे चाहिए जवाब," मैंने कहा। "एक जवाब। काली डायरी किसके पास है। बस इतना।"

वो मेरे पास आया। फाटक की दरार से हाथ निकालकर उसने मेरी कमीज़ पकड़ी — जैसे जुगनू ने रात में पकड़ी थी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"मेरा नाम नहीं आएगा?" उसने पूछा।

"नहीं आएगा।"

"मेरी दीदी का भी नहीं?"

"किसी का नहीं।"

उसने एक गहरी साँस ली और फिर बहुत जल्दी, बहुत हड़बड़ी में, उसने मेरी जेब में एक काग़ज़ खोंस दिया।

"इसे संभालकर रखना," उसने फुसफुसाया। "मैंने इसे कहीं दर्ज नहीं किया। ये किसी की कॉपी में नहीं है। मैंने इसकी नक़ल भी नहीं की।"

मैंने जेब से निकाला।

रसीद थी। टोल की रसीद। पर अजीब। जहाँ तारीख़ लिखी जाती है, वहाँ पूरी तारीख़ नहीं थी। सिर्फ़ एक शब्द छपा था।

सत्ताईस।

साल नहीं। महीना नहीं। नाम नहीं। रकम नहीं। दूसरी तरफ़ टोल की मोहर, और उस मोहर के नीचे नीले रंग का एक धुँधला गोल निशान, ठीक वैसा जैसा नैना के काग़ज़ों पर, कबीर के जले पन्ने पर, और मोहन जोशी की रसीद पर था।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"ये कल की है।"

"कल सत्ताईस नहीं था।"

"नहीं था," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये काग़ज़ पहले से छपे आते हैं। ऊपर से। महीने में एक बार। जिस दिन काँच के दफ़्तर वाली गाड़ियाँ आती हैं। और जिस दिन ये आती हैं, उस दिन के काग़ज़ों पर साल नहीं छपता। तारीख़ नहीं छपती। सिर्फ़ सत्ताईस छपता है। जैसे वो दिन हर महीने लौटता हो।"

मेरे हाथ में वो काग़ज़ इतना हल्का था कि लगा कुछ नहीं है।

"टीटू, इसका मतलब क्या?"

वो और पास आया। उसकी साँस मेरे कान तक आ रही थी।

"मतलब ये है कि सारा हिसाब एक जगह नहीं है। दो जगह है। एक यहाँ, काउंटर पर, जो चलता है। और एक—"

और फिर पीछे से आवाज़ आई।

"टीटू!"

हम दोनों रुक गए।

"टीटू, कहाँ हो?"

आवाज़ टोल के पिछवाड़े से आई थी। सीढ़ी के ऊपर से। मर्द की आवाज़ — न ऊँची, न गुस्से वाली। इतनी आम कि जैसे किसी ने चाय के बीच से उठकर पुकारा हो। और उसी वक़्त पिछवाड़े में किसी ने टॉर्च जलाई, और रोशनी दीवार पर फिरकर फाटक की दरार पर पड़ी।

टीटू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

सच में सफ़ेद। मैंने पहले सुना था कि किसी का चेहरा सफ़ेद पड़ जाता है, पर पहली बार देखा। खून जैसे भाग गया हो अंदर।

"टीटू," मैंने धीरे से कहा। "घबरा मत। जवाब दे। कह दे, आ रहा हूँ।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"टीटू!" आवाज़ फिर आई। इस बार थोड़ी करीब।

वो मेरे कान के पास झुका। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उसे सुनने के लिए आँखें बंद करनी पड़ीं — जैसे मैं किसी गाड़ी के इंजन के अंदर की आवाज़ सुनता हूँ।

"अगर मेरा कुछ हो गया," उसने कहा, "तो काली डायरी बनवारी लाल के पास है।"

"बनवारी—"

"बाईस नंबर टोल का मुनीम। वो चश्मा लगाता है। पतला आदमी। दस साल से वहीं बैठा है।"

"टीटू—"

"और भैया," उसका हाथ मेरी कमीज़ पर था, "वो जो पर्ची तुम्हारी जेब में है, उसका मतलब ये नहीं है कि सिर्फ़ एक दिन का हिसाब है। उसका मतलब है—"

फिर टॉर्च की रोशनी सीधे दरार पर आई और किसी ने फाटक को अंदर से धक्का दिया। जंग लगा लोहा चरमराया।

टीटू ने मेरी कमीज़ छोड़ी और तीन कदम पीछे हटकर भागा। उसके पैरों की चप्पल धातु की सीढ़ी पर पड़ी — चर… चर… चर… — और फिर वो अंदर के अंधेरे में ग़ायब हो गया।

मैंने फाटक पकड़ा। दरार से देखा।

सिर्फ़ एक टीन का ड्रम दिखा। उल्टा पड़ा। और उसके पीछे से कोई गुज़रा — पतला साया, हाथ में रोशनी, और एक आवाज़ जो हँस रही थी। पर वो हँसी आदमी की नहीं लगी। वो उस तरह की आवाज़ थी जो आदमी अपनी माँ के सामने निकालता है, जब वो जानता है कि सब ठीक है।

"अर्जुन।"

नैना ने मेरा कंधा पकड़ा।

मैंने पीछे देखा। उसका चश्मा नीचे गिरा हुआ था, और उसने उसे उठाया भी नहीं। उसका हाथ काँप रहा था।

"तूने सुना?" मैंने कहा।

"सुना।"

"बनवारी लाल।"

नैना ने अपना बैग उठाया। उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे किसी ने सब कुछ एक तरफ़ रख दिया हो और सिर्फ़ काम बचा हो।

"अब मैं तुझसे एक बात कहूँगी," उसने कहा। "और तू मानेगा।"

"बोल।"

"जब कभी कोई लड़का कहे कि अगर मेरा कुछ हो जाए, तो—" वो रुकी। उसने नीचे देखा। फिर मेरी तरफ़। "उस दिन के बाद हम उसे अकेला नहीं छोड़ेंगे।"

मैंने जेब से वो रसीद निकाली और उसे दोनों हाथों से खोलकर देखा। सूरज की रोशनी में 'सत्ताईस' छोटा लग रहा था। इतना छोटा कि कोई कहे, ये तो कुछ नहीं है भाई। ये तो पुराना है।

मैंने उसे सिली कॉपी के अंदर, आठवें पन्ने पर रखा, और चारों तरफ़ मोड़कर दबाया।

"चल," मैंने कहा। "अब हमें उस आदमी से मिलना है जो दस साल से काउंटर पर बैठा है और सब जानता है।"

नैना ने मेरा हाथ पकड़ा और एक पल के लिए रोक दिया।

"अर्जुन।"

"हाँ।"

"उस रसीद पर साल नहीं है," उसने कहा। "और मेरे पास जो काग़ज़ तेरह काग़ज़ों वाले बंडल में है, उसमें भी एक रसीद है जिस पर साल नहीं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो?"

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