A Dark Secret – Chapter 1
सुबह के चार बजे थे।
बस ने मुझे वहाँ उतारा जहाँ सड़क का कोई नाम नहीं लिखा था। पर हवा में इतनी चीज़ें बोल रही थीं कि नाम की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। डीज़ल की महक, जली हुई रबर की महक, और उसके ऊपर एक पतली सी मीठी गंध — पान की। दूर कहीं एक ट्रक ने हॉर्न मारा। फिर दूसरे ने। फिर पूरा शहर एक साथ चिल्ला उठा, जैसे सबने मिलकर तय कर लिया हो कि आज सोना नहीं है।
मैं बस से उतरा। पैर ज़मीन पर पड़े तो धूल उड़ी और मेरी पैंट पर बैठ गई। बस का कंडक्टर मेरे पीछे से बैग धकेलकर नीचे फेंकने ही वाला था, पर मैंने पहले ही पकड़ लिया।
"भईया, ज़रा संभलकर। अंदर तुम्हारी बहन का सामान नहीं है, मेरी पूरी दुनिया है।"
वो हँसा। "दुनिया छोटी है तेरी।"
"छोटी है, पर भारी है।" मैंने बैग कंधे पर टांगा।
बस चली गई। धुआँ उड़ता रह गया। और मैं वहाँ खड़ा रह गया — छब्बीस साल का, मध्य प्रदेश के एक क़स्बे से निकला, जेब में चार सौ रुपये, कलाई पर पापा की घड़ी। घड़ी पाँच मिनट आगे चलती है। पापा कहते थे, जो आदमी वक़्त से पाँच मिनट आगे चले, उसे कोई धोखा नहीं दे सकता। मैं आज तक समझ नहीं पाया कि ये बात समझदारी की थी या बहाना। पर मैंने घड़ी कभी ठीक नहीं की।
सामने ट्रांसपोर्ट नगरी पड़ी थी। बड़ी, काली, और बिना सोई हुई।
सड़क के दोनों तरफ़ ट्रक ही ट्रक। किसी की छत पर तिरपाल बंधा था, किसी के पहिये के नीचे ईंटें रखी थीं, किसी के पीछे लाल बत्ती जल रही थी जैसे कोई आँख झपक रही हो। बीच में ढाबों की कतारें थीं, जहाँ अभी भी तवे पर रोटी सिंक रही थी। चाय की केतली से भाप निकल रही थी। दो ड्राइवर एक चारपाई पर बैठे थे और कोई पुरानी फ़िल्मी बात कर रहे थे।
मैंने बैग नीचे रखा और सड़क पार करने लगा। तभी भीड़ दिखी।
सड़क के ठीक बीच में लोग जमा थे। सैकड़ों नहीं, तो भी पचास-साठ। और उस भीड़ के बीच में पलटा हुआ एक ट्रक पड़ा था। मोटी, लाल रंग की गाड़ी। उसका एक पहिया अभी भी हवा में घूम रहा था। धीरे-धीरे। जैसे कोई थका हुआ आदमी आख़िरी बार हाथ हिला रहा हो।
मैं भीड़ तक गया।
ट्रक का पीछे वाला हिस्सा उखड़ गया था। आगे का हिस्सा सड़क की रेलिंग में घुसा था। शीशा टूटा था, पर केबिन खाली था। ड्राइवर निकाल लिया गया था। कोई कह रहा था कि वो बच गया, बस पैर में चोट है। कोई कह रहा था कि भगवान का शुक्र है, रात में हुआ, दिन में होता तो बच्चे मर जाते।
और कोई नहीं सुन रहा था।
कोई नहीं सुन रहा था कि उस ट्रक के नीचे से आवाज़ आ रही है।
मैं वहाँ खड़ा था और मुझे सुनाई दे रहा था। भीड़ को नहीं। भीड़ को सिर्फ़ ये सुनाई दे रहा था कि लोहे का टुकड़ा धातु पर रगड़ रहा है। ये शोर है, ये सड़क है, ये रोज़ होता है। पर वो शोर नहीं था।
मैंने बैग नीचे रखा। दोनों हाथ जेब में डाले। आँख बंद कर ली।
तब सुनो, अर्जुन।
पहली आवाज़ — धातु की घिसाई। धीमी, रुक-रुक कर। जैसे कोई दाँत पीस रहा हो। ये केबल की आवाज़ थी। ट्रक की ब्रेक केबल जब खुलती है तो ऐसे ही चिल्लाती है — लंबी, खुरदरी, बीच में एक बार रुककर।
दूसरी आवाज़ — हवा का रिसाव। फुफकार। पतली सी। ये एयर ब्रेक की आवाज़ है जब वो आधा खुला रह जाए। जैसे कोई साँस ले रहा हो और छोड़ने से डर रहा हो।
और तीसरी आवाज़।
तीसरी वाली मैं अब तक किसी को नहीं बता पाया कि कैसे समझाता हूँ। वो न धातु थी, न हवा, न रगड़। वो एक चीख थी जो ट्रक के पेट से निकल रही थी। जैसे किसी गाड़ी ने मदद माँगी हो। कोई ये कहे कि मैं पागल हूँ, कहे। पर उस सुबह उस पलटे हुए ट्रक में एक आवाज़ थी, और वो आवाज़ कह रही थी — मुझे धक्का नहीं लगा। मुझे धक्का दिया गया।
आँख खोली।
भीड़ के पास एक आदमी खड़ा था, नीली शर्ट में, हाथ में चाय का गिलास, और वो मज़े से पी रहा था, जैसे तमाशा देख रहा हो।
मैं उसके पास गया।
"भाई साहब, ये गाड़ी किसकी है?"
"बल्लू की। बलदेव सिंह।" उसने चाय का घूँट लिया। "मोती कहते हैं इसको।"
"और बल्लू?"
"वो वही है।" उसने ठुड्डी से इशारा किया।
भीड़ के किनारे एक आदमी बैठा था। पैंतालीस के आसपास। लंगड़ा रहा था, पैर के लिए कोई खास वजह दिख नहीं रही थी, बस आदत लगती थी। मुँह में पान भरा था, होंठ लाल। हाथ में रुमाल, और रुमाल से खून पोंछ रहा था। अपना खून नहीं। किसी और का। शायद उस चालक का जो उसने खुद निकाला था।
मैं उस ड्राइवर के पास लौटा।
"कब खुलवाया था ब्रेक?"
उसने गिलास नीचे किया। "क्या?"
"ब्रेक। ये गाड़ी का ब्रेक। आख़िरी बार कब खुलवाया था? गैराज में गई थी कि यहीं किसी ने खोला?"
उसने मुझे देखा। ऐसे देखा जैसे मैंने उसकी जेब से पैसे निकाल लिए हों।
"तू कौन है भाई?"
"मैं? मैं अर्जुन हूँ। कल सुबह से पहले यहाँ आया हूँ।" मैंने मुस्कुराकर कहा। "मेरे कान भी इसी बस से उतरे थे, टिकट लेकर आया हूँ।"
वो नहीं हँसा।
पीछे से कोई बोला, "ये नया लड़का क्या बक रहा है? गाड़ी पलटी है, और ये ब्रेक पूछ रहा है।"
मैंने पलटकर देखा। एक मोटा आदमी था, हाथ में लाठी, शायद नाइट चौकीदार।
"भाई साहब," मैंने कहा, "मैं ब्रेक नहीं पूछ रहा, मैं ब्रेक की आवाज़ पूछ रहा हूँ। दोनों में फ़र्क़ है। ब्रेक तो सबका एक जैसा होता है। आवाज़ किसी की एक जैसी नहीं होती।"
चौकीदार ने सिर खुजाया।
तभी मुझे कुछ दिखा। भीड़ के किनारे, एक टीन की छत के नीचे, एक लड़का खड़ा था। ग्यारह बरस का होगा। नंगे पाँव। घुटने पर पुराना निशान। और वो बिना रुके बोल रहा था, जैसे समाचार पढ़ रहा हो।
"चार बजकर सात मिनट पर आई थी, चार बजकर उन्नीस पर पलटी। पीछे से एक बोलेरो आई थी, उसका नंबर मैंने देखा नहीं, पर उसके पहिये की आवाज़ अलग थी, उसमें एक पत्थर फँसा था।"
मैंने उसे देखा। उसने मुझे देखा। और फिर वो चुप हो गया, जैसे किसी ने उसका बटन दबा दिया हो।
मैंने उसे इशारे से पास बुलाया। वो नहीं आया। बस वहीं से बोला, "तेरे कान अच्छे हैं।"
"तेरी याददाश्त इससे भी अच्छी है।"
वो मुस्कुराया। फिर भाग गया।
मैं फिर बल्लू की तरफ़ मुड़ा। वो अब भी वहीं बैठा था, पर उसका रुमाल अब हिल रहा था। हाथ काँप रहा था। और मुझे पता था कि वो ठंड से नहीं काँप रहा था, क्योंकि उस सुबह गर्मी थी। उमस भरी, चिपचिपी गर्मी, जो सुबह चार बजे भी कमरे में घुसकर गला पकड़ लेती है।
मैं उसके पास बैठ गया। घुटने पर हाथ रखकर।
"बल्लू भाई।"
"हाँ।"
"डर मत। मैं पुलिस नहीं हूँ। मैं तो खुद कल से यहाँ हूँ। मुझे कोई जानता नहीं, मैं किसी को जानता नहीं।"
"फिर क्यों पूछ रहा है?"
"क्योंकि मुझे आवाज़ें सुनाई देती हैं।" मैंने कहा। "और ये गाड़ी अभी भी रो रही है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार ठीक से देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं अपने पापा की आँखों में देख चुका था — वो चीज़ जो आदमी को रात भर जगाए रखती है और सुबह उठने नहीं देती।
उसने पान थूका। दूर। फिर धीरे से बोला, "गाड़ी नई नहीं है। दस साल पुरानी है। ब्रेक मैंने पिछले महीने खुलवाए थे। सोलह तारीख़ को। यादव मोटर गैराज में। महेंद्र भाई के यहाँ।"
मैं रुक गया।
मेरे चाचा का गैराज।
मैंने कुछ नहीं कहा। ये वक़्त उस बात का नहीं था। मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया और आगे सुना।
"उसके बाद गाड़ी ने एक हज़ार दो सौ किलोमीटर किया। कभी शिकायत नहीं। कल शाम को मैंने पहिये के नीचे झाँका, सब ठीक था। रात को मैंने चाय पी, गाड़ी स्टार्ट की, और निकला।"
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